
गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो खासतौर पर मराठी नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और उन्हें रंगोली, फूलों और सजावट से सजाते हैं। इसके साथ ही नए कपड़े पहनकर पारंपरिक व्यंजन बनाते हैं। इस विशेष दिन का हर कोई बेसब्री से इंतजार करता है, लेकिन कई लोग इसकी सही तिथि और समय को लेकर कुछ भ्रमित होते हैं। यहां पर आप ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से गुड़ी पड़वा की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और उससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में जान सकते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 29 मार्च को शाम 04 बजकर 27 मिनट पर प्रारंभ होगी। इसका समापन अगले दिन यानी 30 मार्च को दोपहर 12 बजकर 49 मिनट पर होगा। हिंदू धर्म में उदया तिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए गुड़ी पड़वा का पर्व 30 मार्च को मनाया जाएगा।

गुड़ी पड़वा का पर्व चैत्र नवरात्रि के पहले दिन यानी कि प्रतिपदा तिथि पर पड़ता है। ऐसे में 30 अप्रैल पर जो कलश स्थापना का मुहुर्त या फिर अभिजीत मुहूर्त होगा, उसी समय में गुड़ी पड़वा की पूजा करना उत्तम माना जाएगा। इस तथ्य के अनुआर, गुड़ी पड़वा की पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 13 मिनट से सुबह 10 बजकर 22 मिनट तक है।
इसके अलावा, गुड़ी पड़वा का शुभ मुहूर्त पूजा के लिए दोपहर के 12 बजे से 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। इस दौरान गुड़ी पड़वा की पूजा करने के साथ ही, घर की छत या बालकनी में गुड़ी बांधना बहुत उत्तम सिद्ध हो सकता है। इसके बाद किसी भी प्रकार का कोई शुभ मुहूर्त पूजा के लिए ज्योतिष पंचाग में नहीं बताया गया है।
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गुड़ी पड़वा के दिन प्रातः जल्दी उठकर शरीर पर तेल की मालिश की जाती है, फिर स्नान करके शुद्धि प्राप्त की जाती है। इसके बाद, गुड़ी को अच्छे से सजाकर उस पर सुगंध, फूल और अगरबत्ती लगाई जाती है, और दीपक से गुड़ी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद, गुड़ी को दूध-चीनी और पेड़े का प्रसाद अर्पित किया जाता है। फिर दोपहर के समय, गुड़ी को मीठा प्रसाद अर्पित किया जाता है। परंपरा के अनुसार, गुड़ी पड़वा के दिन विशेष रूप से श्रीखंड-पुरी या पूरन पोली का भोग भी लगाया जाता है। इसके बाद, शाम के समय सूर्यास्त के समय हल्दी-कुमकुम, फूल और अक्षत अर्पित करके गुड़ी को उतार लिया जाता है।
गुड़ी पड़वा को मराठी नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और उन्हें रंगोली तथा फूलों से सजाते हैं। लोग नए कपड़े पहनते हैं और पारंपरिक भोजन तैयार करते हैं। गुड़ी पड़वा के दिन एक विशेष ध्वज, जिसे गुड़ी कहा जाता है, भी फहराया जाता है, जो विजय और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

गुड़ी की पूजा: गुड़ी एक डंडे पर उल्टा रखा गया लोटा होता है, जिस पर चेहरे की आकृति उकेरी जाती है और रेशमी वस्त्र लपेटे जाते हैं। यह विजय, समृद्धि और संरचना का प्रतीक माना जाता है। खासतौर पर महाराष्ट्रीय परंपरा में इसका बहुत विशेष स्थान है। गुड़ी को घर के मुख्य द्वार या छत पर फहराया जाता है, जो नए आरंभ के संदेश को दर्शाता है।
नीम और मिश्री का सेवन: इस दिन नीम की कोमल पत्तियां और मिश्री खाना न केवल एक परंपरा है, बल्कि यह मौसम परिवर्तन के इस समय में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का एक प्रभावी उपाय भी है। यह परंपरा आयुर्वेद का एक उपहार है, जो शरीर को गर्मी के मौसम के लिए तैयार करने में मदद करता है।
पकवान, विशेषकर पूरन पोली: मीठे का स्वाद हर शुभ अवसर पर अनिवार्य होता है, और गुड़ी पड़वा पर अगर पूरन पोली न बनाई जाए, तो त्योहार अधूरा सा लगता है। चने की दाल और गुड़ से बनी यह पारंपरिक रोटी सिर्फ स्वाद में लाजवाब नहीं, बल्कि ऊर्जा और पाचन के दृष्टिकोण से भी अत्यंत फायदेमंद है। यह व्यंजन न केवल शरीर को पोषण प्रदान करता है, बल्कि त्योहार की खुशियों में मिठास घोलता है और उसकी असली आत्मा को महसूस कराता है।
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गुड़ी पड़वा दो शब्दों से मिलकर बना है, जहां "गुड़ी" का अर्थ विजय पताका होता है और 'पड़वा' का मतलब प्रतिपदा तिथि है। गुड़ी पड़वा के दिन मराठी समाज गुड़ी तैयार कर उसकी पूजा करता है और फिर उसे घर के मुख्य द्वार या किसी ऊंचे स्थान पर स्थापित करता है। यह परंपरा विजय और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है।

गुड़ी पड़वा के दिन अधिकतर मराठी घरों में हमें द्वार पर गुड़ी लहराती हुई दिखती है, और इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण है। प्राचीन समय में जब योद्धा युद्ध जीतकर घर लौटते थे, तो वे अपने घर और महल के द्वार पर विजय पताका के रूप में ध्वज लहराते थे। यह परंपरा चैत्र प्रतिपदा से शुरू हुई, जब हिंदू नव वर्ष और विजय उत्सव के रूप में गुड़ी की पूजा कर उसे घर के द्वार या छत पर स्थापित किया जाता है।
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