
हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में चंद्र ग्रहण को एक विशेष ध्यात्मिक घटना माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण काल के दौरान प्रकृति में नकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ जाता है जिसके कारण इस समय सूतक के कड़े नियमों का पालन किया जाता है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु चंद्र ग्रहण के दौरान हो जाती है तो परिवार के मन में अंतिम संस्कार को लेकर कई दुविधाएं और प्रश्न पैदा होते हैं। क्या ग्रहण के साये में शव का दाह संस्कार किया जा सकता है? क्या शास्त्र इसकी अनुमति देते हैं? यह जानना बेहद जरूरी है क्योंकि अंतिम संस्कार का उद्देश्य आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति कराना होता है और इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि या समय का गलत चयन आत्मा की शांति में बाधा डाल सकता है। आइये जानते हैं इस बारे में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से।
शास्त्रों के अनुसार, चंद्र ग्रहण के सूतक काल या ग्रहण की अवधि के दौरान दाह संस्कार करना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। माना जाता है कि ग्रहण के समय यमलोक के द्वार और दैवीय शक्तियां एक विशेष स्थिति में होती हैं।
अगर इस नकारात्मक समय में अग्नि संस्कार किया जाए तो जीवात्मा को कष्ट हो सकता है और उसे उत्तम गति प्राप्त करने में बाधा आती है। इसलिए, अगर किसी की मृत्यु ग्रहण के दौरान होती है तो शव को सुरक्षित रखा जाता है और ग्रहण समाप्त होने की प्रतीक्षा की जाती है।

जैसे ही चंद्र ग्रहण समाप्त होता है और मोक्ष काल आता है, उसके बाद ही अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू की जाती है। लेकिन सीधे दाह संस्कार नहीं किया जाता। सबसे पहले पूरे घर और उस स्थान की शुद्धि की जाती है जहां शव रखा गया है। गंगाजल का छिड़काव करना अनिवार्य होता है ताकि ग्रहण की नकारात्मकता दूर हो सके। इसके बाद ही शव को अंतिम यात्रा के लिए ले जाया जाता है।
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कई बार चंद्र ग्रहण के साथ-साथ 'पंचक' का नक्षत्र भी लगा होता है। अगर ग्रहण और पंचक दोनों एक साथ हों, तो अंतिम संस्कार के नियम और भी कड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में दाह संस्कार से पहले आटे या कुश के पांच पुतले बनाकर उनका भी शव के साथ विधि-विधान से पूजन और दाह किया जाता है। यह प्रक्रिया परिवार के अन्य सदस्यों को दोष से बचाने और मृतक की आत्मा को शांति दिलाने के लिए की जाती है।

सूतक काल में जब तक ग्रहण समाप्त नहीं होता तब तक परिवार के सदस्य मृतक के पास बैठकर भगवत गीता का पाठ या महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर सकते हैं। यह वातावरण को शुद्ध रखता है और जीवात्मा को संबल प्रदान करता है।
ग्रहण के बाद नदी में स्नान करना या घर में शुद्धिकरण के बाद ही अग्नि संस्कार की अग्नि प्रज्वलित की जाती है। शास्त्रों में स्पष्ट है कि धैर्य और शुद्धि के साथ किया गया अंतिम संस्कार ही मोक्षदायी होता है।
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