
आपने अक्सर देखा होगा कि किसी के निधन के बाद उसके घर में कुछ दिनों तक खाना नहीं बनाया जाता है और परिवार के लोग या तो बाहर से भोजन मंगवाते हैं या रिश्तेदार और पड़ोसी इस समय में उनकी मदद करते हैं। मुख्य रूप से जो सबसे करीबी रिश्ते होते हैं वो रसोई में न तो भोजन बनाते हैं और न ही चूल्हा जलाते हैं। यह परंपरा केवल एक रिवाज नहीं, बल्कि इसके पीछे कई धार्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक कारण जुड़े हुए हैं। हिंदू धर्म में जीवन और मृत्यु दोनों को ही एक गहरी आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। जब किसी व्यक्ति का निधन होता है, तो उसके घर में मृत्यु से जुड़े कई नियमों का पालन किया जाता है। ऐसे ही एक परंपरा है घर में चूल्हा न जलाने और भोजन न बनाने की। ज्योतिर्विद पंडित रमेश भोजराज द्विवेदी से जानें इसके पीछे के कारणों के बारे में और गरुड़ पुराण की बात के बारे में।

सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथ गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद की स्थिति और संस्कारों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें यह बताया गया है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा कुछ समय तक उसके घर के आस-पास ही रहती है। ऐसी मान्यता है कि आत्मा इस दौरान अपने परिवार और उनके व्यवहार को देखती है और यह महसूस करती है कि उसके परिजनों का कितना लगाव उसके साथ है। ऐसे में माना जाता है कि मृतक की आत्मा के सामने शोक दिखाना और संयम बरतना जरूरी होता है। चूंकि भोजन किसी भी व्यक्ति की प्राथमित जरूरत है और जब किसी परिजन की मृत्यु के बाद भोजन नहीं बनता है तो ये सीधे तौर पर परिवार जनों के शोक को ही दिखाता है।
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गरुड़ पुराण के अनुसार, जब तक मृतक का अंतिम संस्कार नहीं हो जाता है उस दिन तक घर में चूल्हा नहीं जलाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि मृत्योपरांत भी वह मृतक व्यक्ति आत्मा के रूप में आस-पास ही मौजूद होता है। आत्मा के आस-पास होने के पीछे के कारण यह होते हैं कि आत्मा कुछ दिनों तक अपने परिवार के मोह में बंधी रहती है और शोक के समय सांसारिक कार्यों से दूरी रखना उचित माना जाता है और यह मृतक के प्रति सम्मान व्यक्त करने का भी एक तरीका है। इसी वजह से किसी व्यक्ति की मृत्यु के कुछ समय बाद घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।

आमतौर पर यह नियम उस दिन तक मान्य होता है जब तक मृतक शरीर घर पर ही मौजूद होता है और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने के बाद घर में चूल्हा जलाया जा सकता है, लेकिन कुछ दिनों तक सात्विक भोजन ही बनता है। हालांकि कई जगहों पर यह नियम सिर्फ अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं होता है, बल्कि 3, 7 या कभी-कभी 13 दिनों तक भी घर में खाना नहीं बनाया जाता है और इसे सूतक काल कहा जाता है।
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इस परंपरा के पीछे केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कारण भी छिपे हैं। ऐसा माना जाता है कि घर में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद मृतक शरीर में बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं और इससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, इस वजह से जो भोजन उस स्थान पर बनता है जहां मृतक का शरीर रखा जाता है वह भी दूषित हो सकता है। जब तक मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार नहीं होता है तब तक घर में पूर्ण शुद्धि नहीं होती है। इस वजह से ही भोजन बनाने की मनाही होती है।
जब व्यक्ति इन सभी नियमों का पालन करता है, तो उसे श्रद्धा और परंपरा का सम्मान समझा जाता है। इसलिए किसी परिजन की मृत्यु होने पर उस घर में भोजन बनाने की मनाही होती है।
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