
हिंदू धर्म में जीवन पर्यंत और मृत्यु के उपरांत कई ऐसी प्रथाएं होती हैं जिनका पालन करना अत्यंत जरूरी माना जाता है। मृत्यु किसी भी व्यक्ति के सोलह संस्कारों में से एक मानी जाती है। ऐसे में व्यक्ति के निधन के बाद किए जाने वाले संस्कारों को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। ये संस्कार न केवल दिवंगत आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए किए जाते हैं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को जीवन के गूढ़ सत्य का बोध भी कराते हैं। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में कई ऐसी परंपराएं शामिल होती हैं, जिनका गहरा धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व है। इन्हीं में से एक प्रमुख परंपरा है अंतिम संस्कार के समय पानी से भरी मिट्टी की मटकी को फोड़ना, इस प्रथा को दाह संस्कार के दौरान निभाया जाता है। आइए ज्योतिर्विद पंडित रमेश भोजराज द्विवेदी से जानें इस प्रथा का क्या महत्व है और ये प्रक्रिया अंतिम संस्कार का मुख्य चरण क्यों मानी जाती है।
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, अंतिम संस्कार की सभी क्रियाएं किसी योग्य ब्राह्मण या महापात्र के निर्देशन में की जाती हैं। इस दौरान जो व्यक्ति चिता को अग्नि देता है, वही मुखाग्नि दाता कहलाता है और वही मिट्टी की मटकी फोड़ने की परंपरा भी निभाता है। इस प्रक्रिया में मिट्टी की एक मटकी ली जाती है, जिसमें पानी भरा होता है और उसमें एक छोटा सा छेद कर दिया जाता है। मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति इस मटकी को कंधे पर रखकर चिता के चारों ओर पहले दक्षिणावर्त परिक्रमा करता है और अंत में एक परिक्रमा वामावर्त करता है। इसके बाद वह मटकी को पीछे की ओर फेंक देता है, जिससे वह टूट जाती है। इसे अंतिम संस्कार का एक अहम चरण माना जाता है।
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ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार, मिट्टी की मटकी मृत शरीर का प्रतीक मानी जाती है, जबकि उसमें भरा पानी आत्मा का प्रतीक होता है। परिक्रमा करते समय मटकी से धीरे-धीरे पानी का टपकना इस बात को दिखता है कि समय के साथ शरीर और आत्मा का संबंध कमजोर होता जा रहा है। जब मटकी टूट जाती है, तो यह संकेत होता है कि आत्मा को अब शरीर से पूर्ण रूप से अलग होकर अपनी आगे की यात्रा अकेले ही शुरू करनी चाहिए। शास्त्रों में बताया गया है कि मानव शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है जिसमें जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और आकाश होते हैं। दाह संस्कार और मटकी फोड़ने की क्रिया इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि कि शरीर अब इन पंचतत्वों में विलीन होने जा रहा है। यह आत्मा को यह संदेश भी देता है कि उसके सभी सांसारिक बंधन अब समाप्त हो चुके हैं।
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मटकी का टूटना इस बात का भी प्रतीक माना जाता है कि मृतक के सभी सांसारिक रिश्ते और मोह इसी लोक में समाप्त हो जाते हैं। यह क्रिया आत्मा को मुक्त करती है जिससे वह मोक्ष की ओर अग्रसर हो सके या अपने कर्मों के अनुसार नया जन्म प्राप्त कर सके। इसी वजह से इस परंपरा को अत्यंत भावनात्मक लेकिन आवश्यक माना जाता है। धार्मिक कारणों के साथ-साथ इस परंपरा के पीछे एक व्यावहारिक कारण भी छिपा है। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन काल में अंतिम संस्कार नदी तट पर नहीं, बल्कि खुले खेतों या श्मशान भूमि में किया जाता था। मटकी से गिरता हुआ पानी चिता के आसपास की भूमि को गीला कर देता था, जिससे चिटा से अग्नि फैलने की संभावना कम हो जाती थी। इस तरह यह परंपरा आसपास के क्षेत्र को अग्नि से सुरक्षित रखने का भी एक उपाय थी। उसी समय से यह अंतिम संस्कार का एक मुख्य चरण माना जाने लगा।
मटकी फोड़ते समय चिता की परिक्रमा करना भी विशेष महत्व रखता है। यह परिक्रमा दिवंगत आत्मा के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम मानी जाती है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसे ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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