
हमारे देश में किन्नर समाज के लिए अलग तरह के रीति-रिवाज प्रचलित हैं। किन्नरों का आम लोगों से एक अलग समुदाय हैं जिसके लिए अलग-अलग प्रथाएं हैं। हम सभी इनके बारे में गहराई से जानना चाहते हैं, लेकिन इनके समाज के कुछ रहस्य ऐसे हैं जिनका पता लगा पाना थोड़ा कठिन होता है।
यही नहीं इनकी प्रथाएं भी हमसे अलग होती हैं। किसी भी शुभ काम में इनकी उपस्थिति को जरूरी माना जाता है और इनके आशीर्वाद से काम में शुभता आती है। कुछ मान्यताओं के अनुसार इन्हें ईश्वर का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है।
इनके समाज की एक अनोखी प्रथा है किसी की मृत्यु होने पर दाह संस्कार की। जहां आमतौर पर डाह संस्कार दिन के समय किया जाता है, वहीं किन्नर समाज में किसी की मृत्यु होने पर दाह संस्कार रात के समय किया जाता है। इस प्रथा के बारे में पूरी जानकारी लेने के लिए हमने ज्योतिषाचार्य राधा कान्त वत्स से बात की। आइए जानें इस प्रथा के कारणों के बारे में।

ज्योतिष की मानें तो किन्नरों की शव यात्रा रात के समय इसलिए निकाली जाती है जिससे आम लोग इस यात्रा के दर्शन न कर सकें। यही नहीं इनकी शव यात्रा में किसी और समुदाय का कोई व्यक्ति शामिल नहीं हो सकता है।
एक मान्यता यह भी है यदि कोई इनकी शव यात्रा देखता है तो उसके लिए शुभ नहीं माना जाता है। मान्यता यह भी है कि कोई यदि किन्नरों की शव यात्रा देखता है तो उन्हें इस जीवन से मुक्ति नहीं मिलती है और उन्हें दोबारा इसी समुदाय में जन्म लेना पड़ता है।
ऐसी मान्यता है कि किन्नरों की मृत्यु के बाद उनके दाह संस्कार से पहले शव को जूतों से पीटा जाता है, जिससे उन्हें आगे इस श्रेणी में जन्म न मिले और उन्हें इस जीवन से मुक्ति मिल सके। ज्योतिषाचार्य राधा कान्त वत्स जी बताते हैं कि उनके शव को जूतों से पीटने का कारण यह है कि उन्हें ऐसा जीवन दोबारा न मिले और अगर उनके कोई पाप हैं तो उनसे मुक्ति मिले।
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किन्नरों की मृत्यु के बाद उनका दाह संस्कार भी आधी रात के समय होता है और कोई बाहरी समुदाय या व्यक्ति उनका दाह संस्कार नहीं देख सकता है। उनके शव को जलाने से पूर्व किन्नरों के देवता अरावन का आह्वान किया जाता है और उनसे मुक्ति की प्रार्थना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि जो भी उनकी चिता की राख को घर लाकर रखता है उसे कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती है।
किन्नर समुदाय के लोगों को उनकी मृत्यु के एक महीने पहले से ही मृत्यु का एहसास होने लगता है और वो खुद को एक कमरे में बंद करके ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें इस जीवन से मुक्ति मिल सके। वो अपने इष्ट से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें मृत्यु के बाद मुक्ति मिल जाए। किन्नरों के भगवान अरावन हैं और किन्नर उन्हीं से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें इस तरह के जीवन से मुक्ति मिले।
यदि हम हिन्दू प्रथा की बात करें तो किसी भी शुभ अवसर में किन्नरों का आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है। दरअसल ऐसा इसलिए माना जाता है क्योंकि उन्हें रामायण काल में प्रभु श्री राम से एक आशीर्वाद (क्यों फलता है किन्नरों का आशीर्वाद) मिला था। इसी वजह से किन्नरों की उपस्थिति शादी के बाद या घर में नन्हे मेहमान के आगमन पर शुभ मानी जाती है।
इन्हीं कारणों से मान्यता है कि किन्नरों का शव किसी को देखना नहीं चाहिए और आम लोगों को उनके दाह संस्कार में शामिल होने की मनाही है।
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