
25 मार्च 2026 को देश की संसद से एक ऐसा बिल पास हुआ, जिसके बाद ट्रांसजेंडर समुदाय की पहचान को लेकर एक बहस छिड़ गई है। 13 मार्च, 2026 को केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार ने संसद में एक महत्वपूर्ण विधेयक पेश किया था- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन। अब लोकसभा में 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026' को पारित कर दिया गया है। इस बिल में भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कानूनी मान्यता देने के तरीके में बदलाव किया गया है। इसमें ट्रांसजेडर की पहचान के लिए कुछ ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जो 2019 के ट्रांसजेंडर अधिनियम से अलग है। इस बिल के पास होने के बाद से ट्रांसजेंडर लोग नाखुश हैं और इसे लेकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। चलिए आपको बताते हैं कि इस बिल में क्या बदला है और क्यों इसे लेकर बहस छिड़ी है?

ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 में ट्रांस व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित करने के लिए कुछ बदलाव किए गए हैं। सरकार का ऐसा कहना है कि ये बिल ट्रांस लोगों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, लेकिन एलजीबीटी+ समुदाय और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से इसे गलत बताया जा रहा है और इसे वापस लेने की मांग की जा रही है। बता दें कि 2019 के ट्रांसजेंडर एक्ट में कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से अपनी पहचान घोषित कर सकता था यानी कोई व्यक्ति खुद ये बता सकता था कि वो खुद को ट्रांस मेन या वुमेन बता सकते हैं। इसके बाद उन्हें जिला मजिस्ट्रेट से सर्टिफिकेट बनवाना होता था और फिर उन्हें सरकार की तरफ से जारी योजनाओं का लाभ भी मिल सकता था और किसी भी ऑफिशियल कागजी कार्यवाही को वो आसानी से पूरा कर सकते थे, लेकिन अब नए बिल के बाद चीजें बदल गई हैं। अब खुद ही अपनी पहचान घोषित करने वाले इस सिस्टम को खत्म कर दिया गया है और ट्रांसजेंडर को अपनी पहचान घोषित करने के लिए मेडिकल टेस्ट करवाना होगा और उसी के बाद उन्हें ट्रांसजेंडर का सर्टिफिकेट मिल पाएगा।
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इस नए बिल में ट्रांसजेंडर लोगों को खुद अपनी पहचान घोषित करने का अधिकार नहीं है। इसके लिए मेडिकल रिपोर्ट्स और सख्त बायोलॉजिकल मानक हैं। ऐसे में कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से इसमें शामिल नहीं हो सकता है। इसके अलावा, जबरदस्ती किसी को ट्रांसजेंडर बनाने पर कड़ी सजा भी दिए जाने का प्रावधान हैं। इस विधेयक का ट्रांसजेंडर लोग विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये काफी गलत है। आखिर क्यों अपनी पहचान साबित करने के लिए उन्हें मेडिकल सर्टिफिकेट की जरूरत है और क्यों उन्हें किसी के सामने खड़ा होना पड़ेगा। बता दें कि इसे लेकर देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन भी हो रहे हैं। उनकी मांग है कि ट्रांसजेंडर की पहचान को इस तरह परिभाषित करना गलत है और इसे बदला जाए। अपनी पहचान साबित करने के लिए इस तरह सुबूत देना सही नहीं है। यह प्राइवेसी और ह्यूमन राइट्स का मुद्दा है। बता दें कि विरोध करने वाले कई ट्रांसजेंडर लोगों का कहना है कि इस बिल को पास करने से पहले उनकी कम्यूनिटी के किसी भी व्यक्ति से चर्चा नहीं की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने नालसा बनाम भारत संघ 2014 के केस में फैसला सुनाते हुए कहा था कि किसी भी व्यक्ति को पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर के तौर पर अपनी पहचान तय करने का पूरा अधिकार है। इसमें किसी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। यही बात साल 2019 के विधेयक में भी थी, लेकिन अब इसके लिए मेडिकल जांच को अनिवार्य कर दिया गया है।
सबसे पहले ये समझना बहुत जरूरी है कि ट्रांसजेंडर एक बहुत बड़ा टर्म है। कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिसकी जेंडर पहचान उनके जन्म के समय तय किए गए लिंग से अलग होती है वो ट्रांसजेंडर हो सकते हैं। इसे आसान तरीके से आप ऐसे समझ सकती हैं कि अगर कोई बच्चा लड़के के रूप में जन्म लेता है, लेकिन वो धीरे-धीरे बड़े होने के साथ खुद की पहचान लड़की के तौर पर महसूस करता है तो वो ट्रांसजेंडर हो सकता है।
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