
ग्रहण और सूतक काल दोनों ही हमारे ज्योतिष शास्त्र में कुछ ऐसी घटनाएं मानी जाती हैं जिनका प्रभाव जीवन में बहुत ज्यादा पड़ता है और ऐसा कहा जाता है कि यह काल साधारण नहीं होता। इस अवधि में वातावरण, ऊर्जा और सूक्ष्म तरंगों में परिवर्तन हो जाता है। इसलिए इस समय किसी भी प्रकार के संस्कार करना सामान्यतः वर्जित माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि आपको सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण या सूतक काल के दौरान किसी भी शुभ काम को करने से बचना चाहिए अन्यथा इसके प्रभाव नकारात्मक हो सकते हैं। जिस प्रकार सूर्य ग्रहण के दौरान पूजा-पाठ करने से मना किया जाता है उसी तरह कई ऐसी भी चीजें और संस्कार हैं जिन्हें करने से इस दौरान मना किया जाता है।
मान्यता यह भी है कि यदि आप इस दौरान अंतिम संस्कार करते हैं या फिर दाह संस्कार की प्रक्रिया करते हैं तो इसके अलग प्रभाव हो सकते हैं। आत्मा की यात्रा को एक महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान माना जाता है। ऐसे में इसे ग्रहण या सूतक काल में करना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं माना जाता है। आइए ज्योतिषाचार्य सिद्धार्थ एस.कुमार से जानें इसके बारे में कि किसी भी ग्रहण या सूतक काम के दौरान अंतिम संस्कार करने से मना क्यों किया जाता है।
ग्रहण को शास्त्रों में दोष काल कहा जाता है। इस दौरान यज्ञ, जप, हवन और अन्य वैदिक कर्मकांड करना सामान्य रूप से शुभ नहीं माना जाता है और इन कार्यों को करने की मनाही होती है। जिस तरह से पूजा-पाठ के दौरान मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ठीक उसी तरह से अंतिम संस्कार में भी मंत्रोच्चार, अग्नि और विधि-विधान से की गई प्रक्रिया शामिल होती हैं।

इसी वजह से सूर्यग्रहण के दौरान इनका आयोजन टालना ही श्रेयस्कर माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि यदि आप ग्रहण की पूरी अवधि में कोई भी संस्कार जैसे जन्म या मृत्यु से जुड़े संस्कारों का पालन करती हैं तो आपके जीवन में सदैव खुशहाली बनी रहती है। इसी वजह से इस दौरान किसी भी संस्कार या उससे जुड़ी किसी भी अन्य प्रक्रिया को टालना ही शुभ माना जाता है। ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान, शुद्धि और फिर उसके बाद ही कोई विधि प्रारंभ करना अधिक शुद्ध और संतुलित माना जाता है।
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सूतक स्वयं शुद्धि और विराम का समय माना जाता है। इस अवधि में घरों में भी पूजा-पाठ स्थगित कर दिया जाता है। यदि ग्रहण और सूतक काल एक साथ हों, तो संवेदनशीलता और बढ़ जाती है। ऐसे समय में अंतिम संस्कार को ग्रहण समाप्ति के पश्चात करना अधिक संतुलित दृष्टिकोण है। यदि ग्रहण का प्रभाव आपके आस-पास या फिर आपके ही देश में है तो ऐसे में सूतक काल मान्य होता है और यह भी कहा जाता है कि सूर्य ग्रहण का सूतक काल लगभग 12 घंटे पहले लग जाता है और चंद्र ग्रहण का सूतक 09 घंटे पहले लगता है।

यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु ग्रहण काल में हो जाती है, तो उसके शरीर को सुरक्षित रूप से रखा जाना चाहिए और ग्रहण का प्रभाव पूरी तरह से समाप्त होने के बाद ही अंतिम संस्कार या उससे जुड़े कर्म करने चाहिए। ऐसी स्थिति में जैसे ही ग्रहण समाप्त हो और ग्रहण काल की शुद्धि विधि पूर्ण हो जाए, उसके बाद ही अंतिम संस्कार करना ठीक माना जाता है। भले ही आपको कुछ घंटों का इंतजार करना पड़े, लेकिन आपको ग्रहण की अवधि में अंतिम संस्कार या उससे जुड़े कामों को करने से बचने की सलाह दी जाती है। यह कुछ घंटों का अंतर हो सकता है, परंतु शास्त्रीय रूप से यह अधिक उपयुक्त माना जाता है और ऐसा भी खा जाता है कि आपको ऐसी स्थिति में ग्रहण के समापन के बाद ही कोई अन्य संस्कार करना चाहिए।
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अगर आप भी इस बारे में नहीं जानती हैं कि ग्रहण के दौरान आपको कौन से काम करने चाहिए या फिर अंतिम संस्कार करना ठीक है या नहीं, तो यहां से जानकारी ले सकते हैं।
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