
पहले पार्ट में आपने पढ़ा कि मोहन स्नेहा से मिलने, रात में ही पहुंच गया था। उसने दरवाजा खटखटाया, इस बार काम वाली ने दरवाजा खोला था। उसमें आवाज लगाते हुए कहा - मेम साहब आपसे कोई मिलने आया है।स्नेहा दरवाजे पर आई तो उसने मोहन को देखा। स्नेहा - अरे तुम इस वक्त यहां क्या कर रहे हो। मोहन - मैडम मैं शादी करने को तैयार हूं, ये सुनते ही जैसे स्नेहा की खुशी का ठिकाना नहीं था , खुशी में उसने मोहन को गले लगा लिया और हंसते हुए बोली। तुम्हें नहीं पता मोहन तुमने कितनी बड़ी गुड न्यूज दी है। मोहन ने कहा - मैडम लेकिन मुझे अभी आपसे एक मदद चाहिए।
स्नेहा - हां हां बोलो।
मोहन - मेरी मां की दवाई खत्म हो गई है और मेरे पास पैसे नहीं है।
स्नेहा - अरे बस इतनी सी बात , वह अंदर गई और फौरन पर्स में से 20 हजार रुपए निकाल कर ले आई और उसे देने लगी।
मोहन ने इतने पैसे देखकर , घबराते हुए कहा - नहीं नहीं मैडम मैं इतने पैसे नहीं ले सकता । ये दवाई बस 500 rs की है।

स्नेहा ने कहा - अरे तुम रखलो, मोहन बार बार मना कर रहा था, लेकिन स्नेहा ने उसे जबरदस्ती पैसे पकड़ा दिए। हार मानते हुए उसने पैसे लिए, लेकिन स्नेहा को 10 हजार तभी पकड़ा दिए। मैं इतने ही लेकर जाऊंगा , मुझे पैदल जाना है।
स्नेहा ने कहा - चलो ठीक है कल सुबह हम इस कॉन्ट्रैक्ट के बारे में बात करेंगे। उस दिन मोहन घर जाते हुए परेशान भी था लेकिन पैसे मिलने की खुशी भी थी। उसने फौरन अपनी मां के लिए दवाई खरीदी और खाना बनाने के लिए साथ सब्जी भी ले गया। आज वो घर पर अपनी मां की पसंदीदा सब्जी पनीर बना रहा था।
मां ने पूछा - इतने पैसे क्यों बर्बाद कर रहा है बेटा , मैं कुछ भी खा लूंगी।
मोहन - नहीं मां मैंने नौकरी बदल दी है और अब मेरे पास अच्छी नौकरी है। सैलरी भी ज्यादा है।
बातों बातों में उसने यह भी कह दिया कि मां मैं इस महीने शादी करने वाला हूं। ये बात सुनकर मां हैरान हो गाई।

शादी ? क्यों अचानक से कैसे, कौन है लड़की।
मोहन ने कहा - मां मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और उससे शादी होगी। उसके घर में कोई नहीं है वो अकेली है। लेकिन अच्छा पैसा कमाती है, लड़की सुंदर भी है।
मां ने कहा - बेटा एक बार मिलवा तो सही।
मोहन - मां मिलवाना तो थोड़ा मुश्किल है, लेकिन शादी के बाद मैं मिलवा दूंगा, आप परेशान मत हो , लड़की बहुत अच्छी है।
मां - ठीक है बेटा , तुझे जो भी ठीक लगे। मोहन ने इसके बाद खाना बनाया और मां को खाना बनाने के बाद दवाई देकर सुला दिया। लेकिन उस रात उसे बिल्कुल भी नींद नहीं आई थी। अगले दिन सुबह उठते ही वो स्नेहा के घर पहुंचा और कॉन्टेक्ट पर साइन करने की बात कही।
स्नेहा - देखो ये मत सोचना कि शादी के बाद मैं तुम्हारे घर में रहूंगी। ये बस साइन वाली शादी है।
मोहन - ठीक है मैडम , मैं आपकी सभी शर्ते मानने को तैयार हूं ।
इसके बाद मोहन ने पेपर पर साइन कर दिया।
अगले ही दिन स्नेहा और मोहन ने कोर्ट मैरिज की और मोहन को अपने साथ अपने मां बाप को मिलाने l गाई।
स्नेहा - पापा मैंने शादी करली है और मैं इसी साथ रहूंगी।
पापा - गुस्से में तिलमिलाते हुए , स्नेहा ये क्या मजाक है?
स्नेहा पापा ये मजाक नहीं है, आप पेपर्स देख सकते हो।
पापा - पेपर्स देखने के बाद जैसे उनके पैरों से जमीन ही खिसक गई थी। उन्होंने गुस्से में अपनी बेटी से कहा - निकल जा यहां से। अब से तू मेरी बेटी नहीं, आज के बाद यहां कभी आने की जरूरत नहीं। ये बोलकर उन्होंने दोनों को घर से बाहर निकाल दिया।
स्नेहा - खुशी खुशी मोहन को कहती है, तुम्हारा काम खत्म, कल अपनी मां को लेकर , सियाराम अस्पताल में आ जाना। वहां उनका ऑपरेशन होगा, मैं आज ही बात कर लूंगी। हर महीने तुम्हें 25 हजार पैसे सैलरी के मिलेंगे और साल खत्म होने के बाद मैं तुम्हें सारे पैसे दे दूंगी। इसके बाद कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो जाएगा।

मोहन - ठीक है मैडम , हाथ जोड़कर धन्यवाद करते हुए वो वहां से निकल गया। इसके बाद मोहन रास्ते में चलते हुए बस यही सोच रहा था कि मां को इस बारे में बताना चाहिए या नहीं। बहुत सोचने के बाद उसने मन ही कहा - मां को जब पता ही नहीं चलने वाला तो बताने की जरूरत क्या है। घर पहुंचकर उसने मां से कहा - कल आपका ऑप्रेशन होने वाला है मां।
मां - ऑपरेशन ? बेटा इतने पैसे कहां से आएंगे।

मोहन - ऑपरेशन , मेरे ऑफिस की मैडम करवाने वाली हैं, आप परेशान मत हो। मां को समझ नहीं आ रहा था, लेकिन उन्होंने ठीक है कहते हुए बात खत्म करदी। अगले दिन मोहन मां को ऑपरेशन के लिए ले गया।
सब कुछ सही से हो गया और मां अब बिल्कुल ठीक हो गई थी। मोहन ने भी दूसरी नौकरी ढूंढ ली थी और हर महीने 25 हजार उसे स्नेहा भी भेज रही थी। स्नेहा के भेजे जाने वाले पैसों से अब मोहन के घर के हालात ठीक हो गए थे। उसने पैसे बचाएं और कॉन्टेक्ट खत्म होने का इंतजार किया। कॉन्ट्रैक्ट के पैसे मिलने के बाद उसने खुद की कपड़ों की दुकान खोली और अपनी मां के साथ दुकान चलाने लगा। दुकान अच्छे से चल रही थी और स्नेहा की वजह से उसकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो गई थी।

यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।
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