
होली केवल एक त्योहार ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत पहचान भी है। यह ऐसा उत्सव है जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जा रहा है। इसे आपसी प्रेम, भाईचारे और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है और रंग खेलने वाली होली से एक दिन पहले होता है। यह नकारात्मकता, अहंकार और अन्याय के दहन का संदेश देता है। होली को लेकर हर बार की तरह मन में कई सवाल हैं और गूगल ट्रेंड्स पर भी लोग इन सवालों के जवाब ढूढ़ रहे हैं। साल 2026 में होली का पर्व खास संयोगों और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जाएगा, इसलिए इसकी सही तिथि और शुभ मुहूर्त तो जानना जरूरी है ही और इस बारे में भी जानकारी लेना जरूरी है कि अलग-अलग स्थानों पर यह पर्व किस तरह से मनाया जाता है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में होली का अंदाज निराला होता है। जहां एक तरफ ब्रज की धरती पर राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी लठमार होली और फूलों की होली मनाई जाती है, वहीं वाराणसी की मसान होली जीवन और मृत्यु के दर्शन को रंगों में पिरो देती है। कहीं ढोल-नगाड़ों की धुन पर रंग-गुलाल उड़ता है तो कहीं भक्ति रस में डूबी होली मनाई जाती है। आइए ज्योतिर्विद पंडित रमेश भोजराज द्विवेदी से जानें होली के पर्व से जुड़ी परंपराओं और मान्यताओं के बारे में यहां।

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होलिका दहन को लेकर इस बार असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 2 और 3 मार्च को पूर्णिमा तिथि है और 3 मार्च को चंद्रग्रहण भी लग रहा है। ऐसे में होलिका दहन का पूजन 02 मार्च की रात ही करना शुभ माना जा रहा है। वहीं धुलेंडी के दिन होली पूजन के कई शुभ मुहूर्त मिल रहे हैं इसमें से ब्रह्म मुहूर्त सबसे शुभ है और यदि आप इसी मुहूर्त में भगवान को रंग-गुलाल अर्पित करेंगे तो अत्यंत शुभ होगा।

होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है और इसका धार्मिक महत्व बहुत ज्यादा है। इस दिन को भक्त प्रह्लाद और भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान की भक्ति से रोकने के लिए अनेक प्रयास किए। अंत में उसने अपनी बहन होलिका से आग्रह किया कि वो प्रह्लाद को अग्नि में लेकर बैठ जाए जिससे वो अग्नि में जलकर मृत्यु को प्राप्त हो जाए। होलिका ने ऐसा ही किया, लेकिन अग्नि में जलकर स्वयं ही भस्म हो गई और प्रह्लाद बच गए। तभी से यह पर्व बुराई के अंत और भक्ति की विजय के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग लकड़ी, उपले और सूखी टहनियों से होलिका सजाते हैं और पूजा के बाद अग्नि प्रज्वलित करते हैं। अग्नि की परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

ब्रज में होली का उत्सव एक या दो दिन नहीं चलता है बल्कि यह पूरे 40 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान लड्डूमार होली, लठमार होली, फूलों की होली और रंगोत्सव का खास संगम देखने को मिलता है। ब्रज की होली पूरे देश में प्रसिद्ध है। यहां होली केवल एक दिन नहीं, बल्कि कई दिनों तक मनाई जाती है। श्रीकृष्ण और राधा की नगरी में होली का उत्साह देखते ही बनता है। यहां बांके बिहारी मंदिर में फूलों की होली विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। इस दौरान मंदिर में भक्तों पर रंगों के साथ-साथ फूलों की वर्षा की जाती है। वृंदावन की होली में भक्ति, संगीत और रासलीला का अनूठा संगम देखने को मिलता है। वहीं लड्डूमार होली में भक्त मंदिर के प्रांगण में लड्डू बरसाते हैं, जो ब्रज के होली उत्सव की आधिकारिक शुरुआत का प्रतीक होती है। राधा और कृष्ण की दिव्य कथाओं से जुड़ी यह रस्म आनंद, भक्ति और उत्सव का प्रतीक है।
ब्रज क्में लठमार होली भी बहुत खास है और ये उत्सव दो दिनों तक मनाया जाता है। यह उत्सव बरसाना में शुरू होता है, जहां नंदगांव के पुरुष राधा के गांव में होली खेलने आते हैं। अगले दिन, बरसाना की महिलाएं उत्सव को जारी रखने के लिए नंदगांव जाती हैं। इस उत्सव में महिलाएं पुरुषों पर लाठी बरसाती हैं और वो बचने की कोशिश करते हैं। बरसाना और नंदगांव की होली देखने के लिए देश-विदेश से हजारों पर्यटक पहुंचते हैं।

वाराणसी की मसान होली एक अनोखी और आध्यात्मिक परंपरा है। यहां श्मशान घाट पर चिता की भस्म से होली खेली जाती है। यह परंपरा जीवन और मृत्यु के सत्य को स्वीकार करने का प्रतीक है। इस होली में साधु-संत भस्म लगाकर नृत्य करते हैं और भगवान शिव की आराधना करते हैं। यह होली बताती है कि जीवन क्षणभंगुर है और हर पल को उत्सव की तरह जीना चाहिए। वाराणसी की मसान होली देखने के लिए पर्यटक दूर-दूर से वाराणसी पहुंचते हैं।
मसान होली काशी के मणिकर्णिका घाट में होती है और इस होली को सबसे अलग माना जाता है। इसकी कथा के अनुसार जब भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती को लेकर वाराणसी पहुंचे तब उन्होंने अपने भक्तों के साथ रंगों की और फूलों की होली खेली, लेकिन इस होली में उनके भूत गण शामिल नहीं हो पाए। ऐसे में भगवान शिव ने द्वादशी तिथि के दिन भूत प्रेतों के साथ मसान वाली होली खेली। इसी वजह से आज भी काशी में मसान होली द्वादशी तिथि के दिन खेली जाती है और यह होली अघोरी-साधु ही खेलते हैं। इस होली में गृहस्थ लोगों के प्रवेश की मनाही होती है। हालांकि गृहस्थ लोग भी इसे दूर से देख सकते हैं, लेकिन इस होली में शामिल नहीं हो सकते हैं।
हमारे देश भारत के कुछ स्थानों पर होली का सेलिब्रेशन कुछ अलग होता है और लोग दूर-दूर से देखने आते हैं। आइए जानें उन स्थलों के बारे में-
होली का पारंपरिक उत्सव मनाने के लिए मथुरा सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है। स्थानीय लोग मंदिरों और घरों में अनुष्ठान करते हैं। मथुरा वह स्थान है जहां भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। मथुरा और वृंदावन के पवित्र शहर होली के पर्व में रंगों से सराबोर हो जाते हैं। सबसे अच्छा उत्सव बांके बिहारी मंदिर में मनाया जाता है, जहां होली से एक दिन पहले से ही उत्सव शुरू हो जाता है। होली की पूर्व संध्या पर, लोग एक-दूसरे पर फूल फेंकते हैं। होली से पहले सुबह-सुबह बांके बिहारी मंदिर से एक जुलूस निकलता है जो मथुरा तक जाता है। होली के दिन, मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में रंगों का त्योहार मनाया जाता है।
मथुरा के निकट स्थित नंदगांव और बरसाना की होली को बिल्कुल अलग तरीके से मनाया जाता है। यहां की महिलाएं पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं और पुरुष ढाल से इसे बचाने की की कोशिश करते हैं। इसे लठमार होली कहा जाता है। यह होली रंगों वाली होली से एक सप्ताह पहले मनाई जाती है। लठमार होली से कुछ दिन पहले लोग एक-दूसरे पर मिठाई फेंकते हैं और इसे लड्डू होली कहा जाता है। बरसाना में उत्सव समाप्त होने के बाद, स्थानीय लोग नंदगांव गांव पहुंचकर होली क उत्सव का पूरा आनंद उठाते हैं।

पंजाब में होली का एक पुरुष प्रधान संस्करण मनाया जाता है। यहां 18वीं शताब्दी की शुरुआत से ही होला मोहल्ला मेला आयोजित किया जाता रहा है। इस उत्सव के दौरान, लोग मार्शल आर्ट प्रदर्शन, नकली युद्ध, प्रतियोगिताएं, सैन्य अभ्यास प्रदर्शन, तलवारबाजी आदि के माध्यम से शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन करते हैं। इस त्योहार के दौरान युद्ध में पुरुषों और महिलाओं के साहस पर कई चर्चाएं आयोजित की जाती हैं। पंजाब में होली मनाने के लिए सबसे अच्छी जगह आनंदपुर साहिब मानी जाती है।

उदयपुर में होली को होलिका की मृत्यु के दिन के रूप में मनाया जाता है। प्रहलाद की मौसी ने बालक प्रहलाद को गोद में लेकर स्वयं को अग्नि में झोंक दिया था। हालांकि, अग्नि में होलिका का दहन हो गया कर उसकी मृत्यु हो गई। जबकि प्रहलाद बिना किसी परेशानी के चिता से बाहर निकल आए। इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के दिन के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर, लोग बुराई को दूर भगाने के लिए होलिका दहन करते हैं। यह रस्म सिटी पैलेस के भीतर संपन्न की जाती है।
जयपुर कभी होली मनाने के लिए सबसे रोमांचक जगहों में से एक हुआ करता था। इसे हाथी उत्सव के रूप में जाना जाता था। इसमें हाथियों पर रंग छिड़कना, रस्साकशी, लोक नृत्य और संगीत, हाथी सौंदर्य प्रतियोगिताएं आदि शामिल थे। हालांकि ये पशुओं पर अत्याचार था, इसलिए इसे साल 2012 में बंद कर दिया गया। जयपुर में होली आज भी नृत्य, संगीत और रंगों के साथ मनाई जाती है।
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और संबंधों को मजबूत करने का अवसर भी है। होलिका दहन की अग्नि में लोग अपनी बुरी आदतों, ईर्ष्या, क्रोध और नकारात्मक विचारों को त्यागने का संकल्प लेते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची आस्था और सकारात्मक सोच से हर कठिनाई पर विजय पाई जा सकती है।
होली का पर्व भारत के सबसे प्रमुख पर्वों में से एक है और इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग तरीकों से मनाया जाता है। आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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