
नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा का विधान है। 19 मार्च को शैलपुत्री की पूजा होगी। शैलपुत्री का अर्थ होता है पर्वत की बेटी। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। मां शैलपुत्री को शक्ति, धैर्य और शांति का प्रतीक माना जाता है। सफेद वस्त्र धारण किए हुए माता के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन बैल है। आइए इनके व्रत में पढ़ने वाली संपूर्ण कथा के बारे में जानते हैं।
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, मां शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं और उनका नाम सती था। माता सती का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन अपने अपमान का बदला लेने के लिए भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा।
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माता सती ने जब सुना कि उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है, तो उनका मन वहां जाने के लिए व्याकुल हो उठा। भगवान शिव ने उन्हें बिना निमंत्रण जाने से मना किया और कहा कि बिना बुलाए जाना उचित नहीं है। परंतु माता सती के बार-बार आग्रह करने पर शिवजी ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी।

जब सती अपने पिता के घर पहुंचीं, तो वहां किसी ने भी उनसे प्रेमपूर्वक बात नहीं की। उनके पिता दक्ष ने भी भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया और पूरे दरबार में उनका तिरस्कार किया। अपने पति का यह अपमान माता सती सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने महसूस किया कि यहां आना उनकी भारी भूल थी। क्रोध और ग्लानि में भरकर माता सती ने उसी यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।
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सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव अत्यंत दुखी और क्रोधित हुए। अगले जन्म में माता सती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और वे 'शैलपुत्री' कहलाईं। इस जन्म में भी उन्होंने कठिन तपस्या करके भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में प्राप्त किया। मां शैलपुत्री का यह रूप हमें सिखाता है कि अडिग संकल्प और कठिन तप से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

मां शैलपुत्री की कथा का पाठ करने से साधक के भीतर आत्मबल और धैर्य का संचार होता है। यदि आप भी अपने जीवन में स्थिरता और मनोवांछित फल चाहते हैं, तो नवरात्रि के प्रथम दिन इस कथा का श्रवण अवश्य करें।
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