
होलाष्टक हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा यानी कि होलिका दहन तक का समय होता है। इस आठ दिवसीय अवधि में कुछ कामों की मनाही होती है और पूजा-पाठ करने की सलाह दी जाती है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नए कार्यों की शुरुआत और अन्य शुभ कार्यों को वर्जित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन दिनों नकारात्मक ऊर्जाएं अपने चरम पर होती हैं, जिससे शुभ कार्यों में बाधाएं आ सकती हैं। पौराणिक दृष्टि से देखा जाए तो यह काल भक्त प्रह्लाद के कष्टों से जुड़ा हुआ है, जिन्हें उनके पिता हिरण्यकश्यप ने इन आठ दिनों तक प्रताड़ित किया था। उसी समय से होली के पहले के आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में माना जाता है और इस दौरान कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से यह समय ऋतु परिवर्तन का होता है, जब मौसम के बदलाव के कारण शारीरिक और मानसिक असंतुलन देखने को मिलता है। इस दौरान शरीर का ऊर्जा स्तर भी प्रभावित होता है, जिससे नए कार्यों के सफल होने में बाधा आने लगती है। हालांकि, इस समय में आध्यात्मिक गतिविधियां, दान-पुण्य, मंत्र जाप और हवन करना बहुत शुभ माना जाता है। आइए ज्योतिर्विद पंडित रमेश भोजराज द्विवेदी से जानें होलाष्टक के दौरान शुभ काम न करने की मान्यता के बारे में विस्तार से।

पुराणों की मानें तो होलाष्टक का संबंध भक्त प्रहलाद की कथा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, असुर राज हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को भगवान विष्णु की भक्ति छोड़ने के लिए प्रताड़ित किया था। यह अत्याचार लगातार आठ दिनों तक चला, लेकिन प्रह्लाद अपनी बात पर अडिग रहे।
अंत में, पूर्णिमा तिथि के दिन हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने प्रहलाद को अग्नि में बैठकर जलाने की कोशिश की, उनकी इस कोशिश में वो नाकामयाब हो गईं और अग्नि में स्वयं जलकर भस्म हो गई, जबकि श्री हरि विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे। इस घटना को याद करते हुए आज भी होलिका दहन किया जाता है। यही नहीं होलिका दहन के आठ दिन पहले से ही होलाष्टक का समय शुरू हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद के इन आठ दिनों के कष्टों के कारण होलाष्टक के दौरान किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत आपको भी अशुभ फल दे सकती है।
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होलाष्टक के दौरान मौसम में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है, क्योंकि यह समय सर्दी और गर्मी के संधिकाल का समय होता है। इस अवधि में तापमान में अस्थिरता बनी रहती है, जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और वायरल संक्रमण, सर्दी-खांसी, एलर्जी जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
मौसम में होने वाले इस परिवर्तन के कारण लोगों के शारीरिक और मानसिक संतुलन पर भी असर पड़ता है। कई लोगों को इस दौरान चिड़चिड़ापन, तनाव और थकान की शिकायत भी हो सकती है। वैज्ञानिकों की मानें तो इस समय ज्यादा भीड़भाड़ वाले समारोहों से बचना चाहिए, क्योंकि इससे संक्रमण बढ़ने का खतरा रहता है।

पारंपरिक मान्यताओं में भी यही कारण बताया गया है कि होलाष्टक के आठ दिनों में विवाह, गृह प्रवेश या अन्य शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। बदलते मौसम के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, इस दौरान लोगों को अधिक सतर्क रहने, हल्का और पौष्टिक भोजन करने, ध्यान और योग का अभ्यास करने की सलाह दी जाती है, जिससे शरीर और मन संतुलित बना रहे।
ज्योतिष की मानें तो होलाष्टक के दौरान ग्रहों की स्थिति में असंतुलन होता है, जिससे मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ सकती है।
इस समय पेड़-पौधे अपनी पुरानी पत्तियां छोड़ते हैं और नए जीवन की शुरुआत की तैयारी करते हैं। यह एक संक्रमण काल होता है, इसलिए इसे शुभ कार्यों के लिए उचित समय नहीं माना जाता। ऐसा कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति इस दौरान समारोह या भीड़ वाली जगहों में शामिल होता है तो उनके स्वास्थ्य पर इसका असर हो सकता है।
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आपको होलाष्टक में कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्यों को करने से बचना चाहिए। कई भक्त इस दौरान व्रत और उपवास भी करते हैं। यही नहीं भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप भी करते हैं और ध्यान साधना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान पूजा-पाठ करना बहुत शुभ होता है। होलाष्टक के दौरान आपको किसी भी तरह के शादी-विवाह आदि से बचना चाहिए, लेकिन पूजा-पाठ से लाभ होता है।
यदि आपके घर में बेटी की नई शादी हुई है तो आपको होलाष्टक में उसकी विदाई नहीं करनी चाहिए। ऐसे ही नई बहू को मायके भेजने के लिए भी आपको ध्यान में रखना चाहिए कि होलाष्टक के दौरान नई बहू को मायके न भेजें।
इस पूरी अवधि के दौरान आप जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और धन का दान करें जो आपके लिए शुभ फलदायी हो सकता है।
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