
प्रयागराज में महाकुंभ में देश-दुनिया से श्रद्धालु और भक्त ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े साधु और संत भी पहुंचे हैं। इन्हीं में नागा साधु भी शामिल हैं। नागा साधुओं को हिंदू धर्म में अहम दर्जा दिया गया है। नागा साधुओं को अपनी कठोर तपस्या, वैराग्य और साधना के लिए जाना जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि वह सांसारिक मोह-माया से दूर रहते हैं और अनुशासित जीवन व्यतीत करते हैं। नागा साधु आम जन के बीच में नहीं रहते हैं और दूर-दराज पहाड़ों और जंगलों में अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
नागा साधुओं के आराध्य भगवान शिव हैं, वह उन्हीं की आराधना में लीन रहते हैं। यही वजह है कि नागा साधु अपने शरीर पर भभूती लगाकर रखते हैं और इसे ही अपना श्रृंगार मानते हैं। नागा साधुओं की दुनिया आम लोगों से तो अलग होती ही है, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन, वह अन्य साधु और संतों से भी अलग जीवन व्यतीत करते हैं। नागा साधुओं को रहन-सहन से लेकर भिक्षा मांगने के लिए भी विशेष परंपरा और नियम का पालन करना होता है। अगर वह नियमों का पालन न करें, तो उन्हें कठोर व्रत करना पड़ता है। नागा साधुओं के लिए भिक्षा मांगने के लिए क्या नियम हैं इसे हमें पंडित आचार्य उदित नारायण त्रिपाठी ने बताया है।

नागा साधुओं को एक दिन में केवल सात घरों से भिक्षा मांगने की अनुमति होती है। नागा साधु सात घर से ज्यादा एक भी घर से अन्न या भोजन नहीं मांग सकते हैं। अगर, उन्हें सात घरों से भिक्षा मांगने के बाद अन्न या भोजन नहीं मिलता है, तो वह उस दिन के लिए व्रत करते हैं। नागा साधु ऐसा इसलिए करते हैं, जिससे वह लालच, लोभ और बचाने की मोह-माया से दूर रह सकें। नागा साधु केवल उतना ही भोजन करते हैं जितना एक जीवन जीने के लिए जरूरी माना जाता है।
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नागा साधु जब भी भिक्षा मांगते हैं, तो वह किसी से आग्रह नहीं करते हैं और न ही दबाव बनाते हैं। उन्हें जो भी भिक्षा मिलती है, वह उसे ग्रहण करते और संतुष्ट रहते हैं। इसी के साथ वह किसी एक पर निर्भर नहीं रहते हैं, यह उनके त्याग, संतोष और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है।

अगर आपके दरवाजे पर नागा साधु भिक्षा मांगने के लिए आते हैं, तो उन्हें बैठाकर भोजन कराने का प्रयास करने की सलाह दी जाती है। वहीं, आप बैठाकर भोजन नहीं करा सकते हैं, तो साधुओं को अन्न और आवश्यक सामग्री देकर सम्मानपूर्वक विदा करना चाहिए। क्योंकि, अगर आपके द्वार से वह खाली हाथ लौट जाते हैं, तो शायद उन्हें पूरा दिन व्रत करना पड़ सकता है। मोह-माया का त्याग, सख्त नियम और अनुशासन ही नागा साधुओं को अन्य से अलग बनाते हैं।
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नागा साधु, कुंभ या अन्य विशेष धार्मिक आयोजन के दौरान ही आम लोगों के बीच आते हैं और फिर अपनी दुनिया में लौट जाते हैं। ऐसे में कई बार सवाल उठता है कि आखिर धार्मिक आयोजनों के बाद नागा साधु कहां चले जाते हैं। माना जाता है कि नागा साधु कुंभ, महाकुंभ और अन्य धार्मिक आयोजनों में आते हैं और फिर पहाड़ों और जंगलों में लौट जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि नागा साधु अपने अखाड़ों के आश्रमों और मंदिरों में रहते हैं।
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Image Credit: Herzindagi
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