what is khadeshwari tapasya by naga sadhu and its significance

नागा साधुओं का सबसे कठिन तप, सालों तक एक पैर पर होना पड़ता है खड़ा; जानें खडेश्वर तपस्या से जुड़े गूढ़ रहस्य

खडेश्वर तपस्या केवल शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं बल्कि मन पर पूर्ण नियंत्रण और इंद्रियों को जीतने के लिए की जाती है। आम इंसान के लिए कुछ मिनट एक पैर पर खड़े होना मुश्किल होता है, लेकिन नागा साधु इसे अपनी अडिग श्रद्धा और योग बल के सहारे सालों तक निभाते हैं। 
Editorial
Updated:- 2026-01-08, 14:41 IST

हिंदू धर्म और अध्यात्म की दुनिया में नागा साधु अपने रहस्यमयी जीवन और कठिन साधना के लिए जाने जाते हैं। नागा साधुओं की परंपरा जितनी प्राचीन है, उनकी तपस्या उतनी ही विचलित कर देने वाली और कठिन होती है। इन्हीं कठिन साधनाओं में से एक है 'खड़ेश्वर तपस्या'। इस तपस्या में साधु घंटों या दिनों के लिए नहीं बल्कि कई वर्षों तक एक पैर पर खड़े रहकर भगवान की भक्ति करते हैं। यह तपस्या केवल शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं बल्कि मन पर पूर्ण नियंत्रण और इंद्रियों को जीतने के लिए की जाती है। आम इंसान के लिए कुछ मिनट एक पैर पर खड़े होना मुश्किल होता है, लेकिन नागा साधु इसे अपनी अडिग श्रद्धा और योग बल के सहारे सालों तक निभाते हैं। आइये जानते हैं इस कठिन तपस्या से जुड़े अन्य रहस्यों एवं नियमों के बारे में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से।

क्या है खडेश्वर तपस्या?

'खडेश्वर' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है 'खड़ा' और 'ईश्वर'। इसका अर्थ है वह साधु जो खड़े रहकर ईश्वर की आराधना करे। इस तपस्या का संकल्प लेने के बाद साधु कभी भी बैठते या लेटते नहीं हैं।

चाहे कड़ाके की ठंड हो, तपती धूप हो या मूसलाधार बारिश वे एक ही स्थान पर खड़े रहते हैं। इस तपस्या का मुख्य उद्देश्य शारीरिक मोह को त्यागना और कष्टों के माध्यम से आत्मा को शुद्ध करना है। साधुओं का मानना है कि इस तरह के कठिन तप से अहंकार पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

khadeshwari tapasya by naga sadhu

सोने और आराम करने का तरीका

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर नागा साधु बैठते नहीं तो वे सोते कैसे होंगे? इसके लिए वे एक विशेष तकनीक का सहारा लेते हैं। साधु अपने सामने एक झूले या रस्सी का सहारा लेते हैं जिस पर वे अपने हाथों को टिकाकर हल्का झुक जाते हैं।

सोते समय भी उनके पैर जमीन पर ही रहते हैं और शरीर का पूरा भार पैरों पर बना रहता है। इस दौरान वे केवल झपकी लेते हैं जिसे 'योग निद्रा' के समान माना जाता है। इस स्थिति में शरीर को आराम तो नहीं मिलता, लेकिन मानसिक शक्ति उन्हें थकावट महसूस नहीं होने देती।

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शरीर पर होने वाले बदलाव

सालों तक खड़े रहने के कारण साधुओं के शरीर पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। लंबे समय तक एक स्थिति में रहने से उनके पैर सूज जाते हैं और शरीर के निचले हिस्से में रक्त का संचार प्रभावित होता है।

कई बार उनके पैर हाथी के पांव जैसे मोटे हो जाते हैं और जोड़ों में अकड़न आ जाती है, लेकिन इन साधुओं का दावा है कि भक्ति और योग के कारण उन्हें दर्द का एहसास होना बंद हो जाता है। उनके लिए शरीर महज एक वस्त्र की तरह होता है जिसके कष्ट उन्हें अपनी साधना से विचलित नहीं कर पाते।

significance of khadeshwari tapasya by naga sadhu

तपस्या की अवधि और संकल्प

खडेश्वर तपस्या की कोई निश्चित समय सीमा नहीं होती, लेकिन आमतौर पर साधु इसे 12 साल तक करने का संकल्प लेते हैं। ज्योतिष और शास्त्रों में 12 साल की अवधि को 'पूर्ण तप' माना जाता है।

कुछ साधु तो इससे भी अधिक समय तक इस अवस्था में रहते हैं। जब यह तपस्या पूरी होती है तो इसे एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। इस दौरान साधु केवल तरल पदार्थ या बहुत कम भोजन ग्रहण करते हैं ताकि शरीर का वजन कम रहे और खड़े रहने में आसानी हो।

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तपस्या के पीछे का आध्यात्मिक रहस्य

नागा साधुओं के अनुसार, खडेश्वर तपस्या मन की चंचलता को रोकने का सबसे बड़ा साधन है। जब शरीर स्थिर होता है तो धीरे-धीरे मन भी स्थिर होने लगता है।

इस कठिन मार्ग को चुनकर वे यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य अपनी इच्छाशक्ति से प्रकृति के नियमों और शारीरिक सीमाओं को भी चुनौती दे सकता है। कुंभ मेलों के दौरान इन खड़ेश्वर साधुओं के दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ती है क्योंकि उन्हें धैर्य और अटूट विश्वास का जीवित उदाहरण माना जाता है।

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