
भारत में धार्मिक मेलों की परंपरा हजारों साल पुरानी है, जिनका आयोजन बड़े स्तर पर किया जाता है। इन्हीं में से दो प्रमुख और पवित्र आयोजन हैं माघ मेला और कुंभ मेला। अक्सर लोग इन दोनों मेलों को एक जैसा मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में इनके आयोजन, अवधि, धार्मिक महत्व और स्वरूप में कई बड़े अंतर हैं। साथ ही इसके आयोजन भी भी अलग-अलग जगह किए जाते हैं। आइए आर्टिकल में विस्तार से जानते हैं कि माघ मेला और कुंभ मेले में क्या अंतर होता है? साथ ही इससे जुड़ी पूरी जानकारी भी विस्तार से जानते हैं, ताकि अगर आप माघ मेले में जाने के बारे में सोच रही हैं, तो आपको हर जानकारी सही तरीके से पता हो। ऐसे में अगर कोई कुंभ में स्नान करने से वंछित रह जाता है, तो
माघ मेला हर साल माघ मास जैसे जनवरी या फरवरी में प्रयागराज में आयोजित किया जाता है। यह मेला मुख्य रूप से गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर लगता है। माघ मास में कल्पवास, स्नान, दान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व माना जाता है। इसकी अवधि 1 महीने की होती है। इसमें साधु- संत, कल्पवासियों और श्रद्धालुओं की भागीदारी होती है। इसमें सबसे ज्यादा लोग माघ पूर्णिमा और अमावस्या में पर स्नान करना शुभ मानते हैं। इसलिए इस दिन तैयारियां भी काफी अच्छी की जाती है। यहां पर लोग पूजा-पाठ जैसे कार्य भी करवाते हैं, जिसके लिए मेले में ही आपको पुजारी और सामग्री दोनों ही मिल जाएगी।

कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है। यह मेला विशेष ज्योतिषीय योग के अनुसार हर 12 वर्ष में चार पवित्र स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित होता है। हर कोई इस चीज को लेकर अक्सर कंफ्यूज रहते हैं कि कुंभ और अर्ध कुंभ की अवधि कितनी होती है। इसलिए इसे जानना भी जरूरी है। कुंभ को ज्योतिषीय ग्रह-नक्षत्रों के हिसाब से आयोजित किया जाता है। यहां पर करोड़ों श्रद्धालु और अखाड़ों की सहभागिता होती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ मेला को कुंभ मेला की वार्षिक परंपरा का छोटा स्वरूप भी माना जाता है। कुंभ न होने वाले वर्षों में माघ मेला श्रद्धालुओं को संगम स्नान और धार्मिक साधना का अवसर देता है।

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हालांकि माघ मेला और कुंभ मेला दोनों ही संगम स्नान और धार्मिक आस्था से जुड़े हैं, लेकिन इनके आयोजन और महत्व में काफी अंतर है। माघ मेला वार्षिक धार्मिक परंपरा है, जबकि कुंभ मेला दुर्लभ और अत्यंत विशाल आध्यात्मिक आयोजन माना जाता है। दोनों ही भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की अद्भुत पहचान हैं।
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Image Credit- Herzindagi
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