
उस दिन बस स्टैंड पर काफी भीड़ थी। जैसे ही बस आई, लोग चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की करने लगे। मैं भी अपनी बारी का इंतजार कर रही थी और बस के पायदान पर चढ़ ही रही थी कि अचानक मुझे दर्द महसूस हुआ। किसी ने पीछे से भीड़ का फायदा उठाकर मेरे एक ब्रेस्ट को पूरी ताकत से दबा दिया था।
मैं कुछ पलों के लिए बिल्कुल सुन्न हो गई। मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या हुआ, क्या किसी की कोहनी लगी, किसी का बैग लगा या फिर किसी ने जानबूझकर ऐसा किया? जब तक मैं संभलती और पीछे मुड़कर देखती, वह शख्स भीड़ में कहीं गायब हो चुका था या शायद मेरे बगल से ही निकलकर बस में आगे बढ़ गया था। वह दर्द जितना शारीरिक था, उससे कहीं ज्यादा मानसिक था। यह बात हमें दिल्ली में रहने वाली सीमा ने बताई। ऐसा उसके साथ कुछ सालों पहले हुआ था।
सीमा बताती हैं कि उस दिन के बाद से उन्हें भीड़ वाली जगहों पर जाने से डर लगने लगा। बस, मेट्रो या मार्केट, जहां भी ज्यादा लोग दिखते हैं, उनका मन घबराने लगता। सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की थी कि वह उस पल कुछ कर नहीं पाईं। उन्हें बार-बार यही लगता रहा कि काश वह मुड़कर उस व्यक्ति को रोक पातीं या जोर से चिल्ला पातीं, लेकिन उस समय वह कुछ समझ ही नहीं पाई थीं।

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी घटनाएं सिर्फ शरीर को नहीं, आत्मसम्मान को भी चोट पहुंचाती हैं। कई महिलाएं इसे छोटी घटना समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, लेकिन इसका असर लंबे समय तक मन में रहता है। अपराधी अक्सर भीड़ का फायदा उठाकर ऐसे काम करते हैं, जिससे पीड़िता को खुद पर ही शक होने लगता है कि जो हुआ वह सच में हुआ भी था या नहीं।
सीमा की कहानी हमें यह समझाती है कि पब्लिक प्लेसेस पर महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ कानून का नहीं, समाज की संवेदनशीलता का भी मुद्दा है। ऐसी घटनाओं पर खुलकर बात करना जरूरी है, ताकि पीड़िताएं खुद को अकेला न समझें और जागरूकता बढ़े। आवाज उठाना, आसपास के लोगों को सचेत करना और खुद को दोष न देना, ये छोटे कदम किसी भी महिला के लिए मानसिक रूप से ताकत देने वाले होते हैं।
अक्सर ऐसी घटनाओं में महिलाएं इसलिए नहीं बोल पातीं क्योंकि उनको शॉक, भ्रम और शर्म महसूस होती हैं। अचानक हुई इस हरकत से दिमाग काम करना बंद कर देता है। यह तय करना मुश्किल होता है कि वह जानबूझकर किया गया था या गलती से। आसपास के लोगों के सामने अपनी गरिमा को लेकर डर महसूस होना।

अगर किसी ने आपको गलत तरीके से छुआ है या दबाया है, तो यह गलती नहीं बल्कि क्रिमिनल फोर्स (Section 354, IPC/BNS) है। आपको ये स्टेप्स उठाने चाहिए-
जैसे ही आपको महसूस हो, बिना डरे चिल्लाएं। 'पीछे हटिए!' या 'क्या बदतमीजी है?' बोलने से अपराधी डर जाता है। चुप रहने से उसका हौसला बढ़ता है।
मुड़कर तुरंत देखें कि आपके पीछे कौन है। अगर वह नजर आ जाए, तो उसे पकड़ें या शोर मचाकर दूसरों को इकट्ठा करें।
अगर आपको लगा है कि वह जानबूझकर किया गया था, तो वह जानबूझकर ही था। 'गलती' और 'बदनीयत' के स्पर्श में फर्क होता है।

बस के अंदर कंडक्टर या ड्राइवर को तुरंत सूचित करें। बस रुकवाएं और पुलिस को फोन (100 या 1091) करें।
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अगर बस में CCTV है, तो इसकी मांग करें। आसपास के लोगों से कहें कि वे गवाह बनें।
इस बात को याद रखिए कि आपका शरीर आपका अपना है। किसी को भी आपकी सहमति के बिना इसे छूने का हक नहीं है। वह आपकी गलती नहीं थी, उस अपराधी की नीयत खराब थी। चुप रहकर उसे अगली महिला के साथ ऐसा करने का मौका न दें। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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