
मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन में सफर करना लाखों महिलाओं की रूटीन का हिस्सा है। लेकिन एक 25 वर्षीय ज्योति के लिए यह सफर एक कभी न भूलने वाले बुरे सपने में तब्दील हो गया। यह घटना पश्चिमी रेलवे लाइन पर उस समय हुई, जिसे हम सबसे सुरक्षित मानते हैं यानी भरी दोपहर।
ज्योति दादर से चर्नी रोड जाने के लिए लेडीज फर्स्ट क्लास डिब्बे में सवार हुई थी। दोपहर का समय होने के कारण डिब्बा खाली था और वह अकेली सफर कर रही थी। उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ मिनट उसकी पूरी जिंदगी के सबसे डरावने पल होने वाले हैं।
जैसे ही ट्रेन ग्रांट रोड स्टेशन पहुंची और चलने को हुई, तभी आखिरी चंद सेकंड में एक व्यक्ति फुर्ती से लेडीज डिब्बे के भीतर घुस आया। शुरुआत में उसने ऐसा नाटक किया जैसे वह हड़बड़ी में गलती से गलत डिब्बे में चढ़ गया हो। ज्योति ने भी मानवता के नाते इसे अनजाने में हुई मानवीय चूक समझा और यह सोचकर नजरअंदाज कर दिया कि शायद अगले स्टेशन पर वह उतर जाएगा।

खौफ का असली मंजर तब शुरू हुआ जब ट्रेन सिग्नल की वजह से दो स्टेशनों के बीच ट्रैक पर रुक गई। सन्नाटे का फायदा उठाते हुए, उस व्यक्ति ने महिला का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए अचानक अजीब आवाजें निकालना और चिल्लाना शुरू कर दिया।
जैसे ही महिला ने घबराकर ऊपर देखा, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह व्यक्ति सरेआम मास्टरबेट कर रहा था और उसकी आंखों में जरा भी खौफ नहीं था; वह सीधे महिला की आंखों में घूरते हुए इस घिनौनी वारदात को अंजाम दे रहा था।
अपनी इस असहनीय पीड़ा को बयां करते हुए महिला ने बताया, "उस पल मैं पूरी तरह सुन्न पड़ गई थी। मेरे शरीर ने जैसे काम करना बंद कर दिया था। न मैं हिल पा रही थी, न ही चिल्लाकर मदद मांग पा रही थी। मेरा दिमाग यह मानने को तैयार ही नहीं था कि दिन के उजाले में, बीच शहर में मेरे साथ ऐसा कुछ हो सकता है।"
महिला ने आगे बताया कि उस व्यक्ति के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी सनक थी। यह घटना साबित करती है कि अपराधियों के मन से कानून का डर किस कदर खत्म होता जा रहा है। भले ही वह शारीरिक रूप से सुरक्षित बच गई, लेकिन इस घटना ने उसकी मानसिक शांति और शहर की सुरक्षा पर भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है।

ट्रेन जब स्टेशन पहुंची, तब वह महिला केवल वहां से भागना चाहती थी। स्टेशन पर उसे दो पुलिसकर्मी दिखे, लेकिन सदमे के कारण वह बोल नहीं पाई। उसने बस ट्रेन की तरफ इशारा किया और वहां से चली गई। बाद में बाहर निकलकर वह फूट-फूटकर रोने लगी। उसे इस बात का पछतावा हुआ कि उसने पुलिस को पूरी बात क्यों नहीं बताई।
ज्यादातर पीड़ितों की तरह, वह भी खुद को दोषी मान रही थी। उसने कहा, "मैं हमेशा खुद को मजबूत मानती थी, लेकिन उस वक्त मैं एक डरे हुए बच्चे की तरह बैठी रही। काश! मैं चिल्लाई होती या उसे थप्पड़ मारा होता।" एक्सपर्ट्स का कहना है कि डर के मारे 'सुन्न पड़ जाना' नेचुरल प्रतिक्रिया है और अपराधी इसी खामोशी का फायदा उठाते हैं।
अगर आपके साथ कभी ऐसा हो, तो तुरंत ये कदम उठाएं।
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भारतीय कानून के तहत अश्लील हरकतें और यौन उत्पीड़न दंडनीय अपराध हैं। आपके पास ये अधिकार हैं।
महिलाओं को बिना किसी डर के यात्रा करने का हक है। जब तक यह हकीकत नहीं बनता, तब तक हमें सतर्क रहना होगा और अपनी आवाज उठानी होगी। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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