
अगर आप दिल्ली में रहते हैं, तो समझ सकते हैं कि मेट्रो कहीं न कहीं हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। मैं उस वक्त दिल्ली में नई आई थी, आंखों में ख्वाब और नई जिंदगी, नए शहर से जुड़े ढेर सारे सपने...कॉलेज के दिन थे और 18-19 साल की उम्र, सब कुछ अच्छा ही लग रहा था। नए शहर और नए लोगों के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश ही कर रही थी, लेकिन तभी अचानक से कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे कॉन्फिडेंस या यूं कहें मेरे आत्मसम्मान को ही हिलाकर रख दिया। एक शख्स की एक हरकत ने मुझे मानो तोड़कर रख दिया, आज उस घटना को लगभग 12 साल बीत चुके हैं, लेकिन जब भी मैं उस घटना के बारे में सोचती हूं या जब भी वो कड़वी याद मेरे दिल के दरवाजे पर दस्तक देती है, सब कुछ मानो कुछ देर के लिए धुंधलाह हो जाता है।
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शाम के लगभग 6 बजे का वक्त था और मैं कॉलेज से ऑटो लेकर राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर पहुंची थी। रोज की तरह ही सिक्योरिटी चेकइन और कार्ड एंट्री करने के बाद मैं प्लेटफॉर्म पर पहुंची। मेरे कंधे पर बैग था, गाने सुनने के लिए हेडफोन्स लगाए हुए थे और ब्लैक कलर की स्कर्ट और टॉप पहना था। प्लेटफॉर्म पर आकर मैंने देखा कि बहुत भीड़ थी, शायद उस दिन यैलो लाइन में कुछ तकनीकी खराबी हुई थी और उसके चलते मेट्रो थोड़ा डिले आ रही थीं। ऐसे में राजीव चौक पर भीड़ बढ़ना तो लाजमी थी। अगर आप भी मेरी तरह मेट्रो में ट्रैवल करती हैं, तो आप ये समझ सकती हैं कि राजीव चौक स्टेशन पर मेट्रो बोर्ड करना कई बार किसी जंग से कम नहीं होता है। मैं प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर मेट्रो का इंतजार कर रही थी, मेरे आगे भी काफी लोग थे और मेरे पीछे भी भीड़ बढ़ती जा रही थी। तभी मेट्रो आई...एकदम हड़बड़ी मच गई...गेट खुला, अंदर से भीड़ बाहर निकल रही थी और बाहर के लोग अंदर जाने की जद्दोजेहद में थे, तभी भीड़ ने पीछे से धक्का दिया और मानो मैं और आगे के सभी लोग प्रेशर से अंदर की तरफ जाने लगे। इसी बीच किसी ने मेरी स्कर्ट के अंदर हाथ डालकर मेरे हिप्स को छूने की कोशिश की और मैं मानो कांपने लगी।

मैं मेट्रो के अंदर थी, भीड़ बहुत थी, गेट बंद हो गए थे और मेट्रो चलने लगी थी, लेकिन मैं मानो रूक गई थी। मेरे आस-पास उस कोच में कई लोग थे, कई चेहरे नजर आ रहे थे, लेकिन मैं समझ नहीं पा रही थी कि वो चेहरा कौन-सा था, जिसने मुझे इस तरह देखा। वो हाथ कौन-से थे, जिसने मुझे ऐसे छुआ। ऐसा लग रहा था मानो वो सब मेरी बेबसी पर हंस रहे हों या मेरा मजाक बना रहे हों। मुझे उस वक्त चीखना चाहिए था, शायद उसके हाथ को पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए थी या उसके बाल खींचकर उसे घसीटना चाहिए था, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाई, जिसका मुझे आज भी अफसोस है।
इस घटना ने मानो मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया था। मैंने इसके बारे में उस दिन किसी को नहीं बताया, शायद हिम्मत ही नहीं हुई। मैं उन दिनों अपने एक रिश्तेदार के यहां रहती थी और हिम्मत करके जब अगले दिन मैंने अपनी आंटी को इस घटना के बारे में बताया, तो उन्होंने बस एक जवाब दिया, तो गलती तु्म्हारी है ...लेडीज कोच में जाना चाहिए था न। उनका ये जवाब मेरे मन में कई सवाल छोड़ गया।
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