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 aaj ka suvichar 15 jan 2026

Aaj Ka Suvichar 15 Jan 2026: सफलता नहीं, 'रस' खोजें! जानें आज का सुविचार जो सीधे दिल पर करेगा वार

यह आर्टिकल जीवन में केवल सफलता के बजाय 'रस' (आनंद, जीवंतता) खोजने पर जोर देता है, क्योंकि वास्तविक सुंदरता इसी में निहित है। यह बताता है कि कैसे लोग विभिन्न चीजों में 'रस' खोजते हैं, जो आदत बन जाती है। गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर का सुविचार हमें अपने भीतर 'रस' खोजने का मार्गदर्शन करता है, सेवा, ज्ञान और कला में स्वस्थ 'रस' को अपनाकर पूर्ण जीवन जीने की वकालत करता है।
Editorial
Updated:- 2026-01-15, 07:30 IST

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हर कोई सफल होना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन सच यह है कि बहुत कुछ पाने के बाद भी मन के अंदर खालीपन बना रहता है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि हमने जीवन को उपलब्धियों की मशीन बना लिया है, जबकि जीवन की वास्तविक सुंदरता उसके 'रस' यानी आनंद, तृप्ति और जीवंतता में छिपी है।

ऐसे में मन में यही सवाल आता है कि यह 'रसमय जीवन' आखिर मिलेगा कैसे? क्या यह पहाड़ों पर जाने से मिलेगा या बैंक बैलेंस से? नहीं! इसका तरीका पूरी तरह से आपके अंदर छिपा है। इसे सही तरीक से जानने के लिए हम आपके लिए गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर का आज के सुविचार लेकर आए हैं।

''रसमय जीवन मानव-मात्र की आकांक्षा है।''
-गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

aaj ka suvichar 15 jan

मनुष्य क्या चाहता है: अस्तित्व या रस?

मनुष्य जीवन में केवल अस्तित्व नहीं चाहता, वह रस चाहता है, आनंद, तृप्ति और जीवंतता का अनुभव। यही कारण है कि हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में रस की खोज में लगा रहता है। कोई धन में रस खोजता है, कोई कला में, कोई मनोरंजन में, रस ढूंढ लेता है। रस ही आदत बनाता है और आदत जीवन की दिशा तय करती है।

जब रस आदत बन जाए

मनुष्य जिन वस्तुओं या गतिविधियों में रस पाता है, वही उसके व्यवहार का केंद्र बन जाती हैं। धन को ही आनंद मान लेने वाला व्यक्ति नोटों के ढेर में अर्थ खोजता है, चाहे उनका उपयोग हो या न हो। इसी प्रकार सिनेमा, टीवी या अन्य मनोरंजन साधनों में भी कई लोग रस के कारण बंधे रहते हैं, भले ही उन्हें स्वयं पता हो कि यह समय और ऊर्जा की हानि है। धीरे-धीरे रस प्राप्ति की प्रक्रिया और स्रोत एक स्वचालित आदत में बदल जाता है, रस चला जाता है, पर आदत बनी रहती है। यह स्थिति विवेकहीनता की ओर संकेत करती है।

रस की विकृत खोज

रस की यह खोज कभी-कभी विकृत रूप भी ले लेती है। दूसरों को सताने, गाली-गलौज करने या पीड़ा पहुंचाने में रस लेना बीमार मन का लक्षण है। इससे भी आगे बढ़कर, कुछ लोग स्वयं को पीड़ित करने में आनंद खोजते हैं। जब रस की खोज गलत दिशा में चली जाती है, तब अन्ततः स्वयं व समाज दोनों के लिए ही दुखदायक होती है।

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स्वस्थ रस, स्वस्थ जीवन

जब रस सेवा, ज्ञान, विज्ञान, संगीत, साहित्य, कला और साधना में प्रकट होता है, तब वह स्वस्थ मन का परिचायक बनता है। प्रखर बुद्धि को तर्क और विज्ञान में रस मिलता है, सरस ह्रदय को संगीत और कला में आनंद मिलता है और संतुलित जीवन में समाधि का रस उत्पन्न होता है।

जीवन में रस लें पर आसक्ति के बंधन में न बंधें। सेवा साधना और सत्संग में रस लें। इस प्रकार का रसमय जीवन न सिर्फ व्यक्ति के आत्मकल्याण का साधन बनता है, बल्कि समाज के उत्थान में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

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एक आनंदपूर्ण जीवन ही हर मनुष्य की सच्ची इच्छा है आज नहीं, अभी से। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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