
हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में ग्रहण को केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और ऊर्जावान घटना माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण के समय ब्रह्मांड में ऊर्जा का संतुलन बिगड़ जाता है और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता है। इसे 'सूतक काल' कहा जाता है जो ग्रहण शुरू होने से कई घंटे पहले प्रभावी हो जाता है। बता दें कि साल का पहला और पूर्ण चंद्र ग्रहण आज यानी कि 3 मार्च 2026 को लग रहा है। ग्रहण को अशुभ समय माना गया है और इसी कारण से शास्त्रों में ग्रहण से जुड़े कई नियम बताए गए हैं जिनका पालन आवश्यक है। इन्हीं नियमों में से एक है मंदिरों के कपाट ग्रहण काल के दौरान बंद हो जाना, लेकिन क्या आप इसके पीछे का कारण जानते हैं? आइये जानते हैं इस बारे में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, ग्रहण के दौरान राहु और केतु का प्रभाव बढ़ जाता है जिससे वातावरण में नकारात्मक तरंगें फैलती हैं। मंदिर एक ऐसा स्थान है जहां सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र होता है।

इस शुद्ध ऊर्जा को बाहरी नकारात्मक प्रभाव से बचाने के लिए मंदिरों के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। माना जाता है कि ग्रहण काल में की जाने वाली पूजा का फल भी विपरीत हो सकता है, इसलिए सामूहिक पूजा-पाठ रोक दी जाती है।
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धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि ग्रहण के दौरान भगवान 'कष्ट' में होते हैं। ऐसे समय में मूर्तियों को स्पर्श करना वर्जित होता है। चूंकि मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है, वे सजीव मानी जाती हैं।
इसी वजह से उन पर ग्रहण की हानिकारक किरणों का असर न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कपाट बंद किए जाते हैं। ग्रहण समाप्त होने के बाद पूरे मंदिर का गंगाजल से शुद्धिकरण किया जाता है, मूर्तियों को स्नान कराया जाता है और उसके बाद ही कपाट दोबारा खोले जाते हैं।

मंदिरों के कपाट बंद होने का एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक पहलू यह भी है कि इस समय को बाहरी आडंबरों या दिखावे की पूजा के बजाय अंतर्मन की साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
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शास्त्रों का मानना है कि इस दौरान सार्वजनिक मंदिर जाने के बजाय व्यक्ति को अपने घर में बैठकर शांत मन से मंत्र जाप और ध्यान करना चाहिए। यह समय मानसिक शांति और आत्म-चिंतन के लिए समर्पित होता है, जिससे ग्रहण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके।
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