
अधिकांश लोग शिवलिंग पर जल तो अर्पित करते हैं, लेकिन पूजन का सही क्रम, भाव और शुद्धि अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। वैदिक परंपरा में शिवलिंग का जलाभिषेक केवल जल चढ़ाने की क्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा-संरेखण की पवित्र प्रक्रिया माना गया है। विशेष रूप से महाशिवरात्रि के दिन इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि इस रात्रि चेतना जागरण और शिव-तत्व से जुड़ने का दुर्लभ योग बनता है।
शास्त्रों के अनुसार सही क्रम और विधि से किया गया जलाभिषेक मनोकामनाओं को संयमित, स्थायी और फलदायी बनाता है। गलत क्रम या अधूरे भाव से किया गया अभिषेक पूजा के पूर्ण फल को रोक सकता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि शिवलिंग पर सबसे पहले किसे जल चढ़ाना चाहिए और इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है।
इसी विषय पर महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर फेमस एस्ट्रोलॉजर सिद्धार्थ एस. कुमार बता रहे हैं शिवलिंग जलाभिषेक का शास्त्रीय क्रम, इसका महत्व और इससे मिलने वाले आध्यात्मिक व मानसिक लाभ। यह जानकारी आपके पूजन को ज्यादा प्रभावशाली और शिव कृपा से पूर्ण बना सकती है।
महाशिवरात्रि 2026 में कुंभ राशि की सक्रिय ऊर्जा के कारण विचार, नेटवर्क और मानसिक स्तर पर गतिविधि तेज़ रहती है। ऐसे समय में गलत क्रम से किया गया अभिषेक ऊर्जा को बिखेर सकता है, जबकि सही क्रम मन, प्राण और कर्म तीनों को एक दिशा देता है। यही कारण है कि शास्त्र क्रम पर इतना जोर देते हैं।

सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि शिवलिंग में केवल भगवान शिव ही नहीं, बल्कि भगवान गणेश, कार्तिकेय, माता पार्वती और शिवजी की पुत्री अशोक सुंदरी का भी वास माना जाता है। इसी कारण शिवलिंग पर जल चढ़ाने की एक विशेष विधि बताई गई है।
सबसे पहले शिवलिंग के दाईं ओर भगवान गणेश पर जल अर्पित करें। इसके बाद बाईं ओर कार्तिकेय जी पर जल चढ़ाएं। फिर शिवलिंग के चारों ओर माता पार्वती पर जल अर्पित करें। जब आप शिवलिंग के चारों ओर माता पार्वती पर जल अर्पित करते हैं, उसी समय अशोक सुंदरी का भी पूजन स्वतः हो जाता है। इसके बाद नंदी महाराज पर जल चढ़ाएं और अंत में शिवलिंग के ऊपरी भाग पर भगवान शिव को जल अर्पित करें।
इस विधि से जल चढ़ाने को पूर्ण और फलदायी माना जाता है।
अभिषेक की शुरुआत साधारण स्वच्छ जल से होती है। यह शिवलिंग और साधक दोनों की प्रारंभिक शुद्धि करता है। इस चरण में मन शांत होता है और बाहरी अशुद्धियां दूर होती हैं। भाव रखें कि आप अहं छोड़कर शिव के चरणों में आ रहे हैं।

दूसरे चरण में जल के साथ कच्चा दूध चढ़ाया जाता है। दूध चंद्र तत्त्व को संतुलित करता है। मन की अशांति, भय और अस्थिरता शांत होती है। यह चरण अभिषेक को भावनात्मक स्थिरता देता है, जो मनोकामना की नींव है।
इसके बाद शहद अर्पित करें। शहद वाणी, संबंध और संकल्प को मधुर बनाता है। यह अभिषेक में संकल्प-शक्ति जोड़ता है, जिससे इच्छा टकराव नहीं बल्कि समाधान की ओर जाती है।
अब फिर से शुद्ध जल चढ़ाएं। यह चरण संतुलन का है। दूध और शहद के प्रभाव को समेटकर शिव तत्त्व में स्थिर करता है। यहां ऊर्जा व्यवस्थित होती है और मनोकामना स्पष्ट होती है।
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अभिषेक के बाद तीन पत्तियों वाला बेलपत्र चढ़ाएं। यह त्रिगुण के संतुलन का संकेत है और संकल्प को धर्म-पथ पर स्थिर करता है। बेलपत्र अभिषेक को पूर्णता देता है।

अंत में एक बार फिर हल्की जलधारा चढ़ाकर शिव को नमस्कार करें। यही वह क्षण है जब मनोकामना को छोड़ा जाता है। आग्रह नहीं, विश्वास के साथ।
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अगर आप इस क्रम से शिव जी का अभिषेक करेंगी तो आपको भोले नाथ का पूरा आर्शीवाद मिलेगा। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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