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क्या मृत्यु के बाद टूट जाते हैं सारे रिश्ते? प्रेमानंद जी महाराज से जानें इस प्रश्न का सही जवाब

मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सत्य है, लेकिन इससे जुड़ा सबसे गूढ़ प्रश्न है कि क्या मृत्यु के बाद सारे रिश्ते समाप्त हो जाते हैं? आइए प्रेमानंद जी महाराज से इस विषय में जानें विस्तार से और आखिर ऐसा क्यों होता है यह भी जानें।
Editorial
Updated:- 2025-10-20, 11:22 IST

मानव जीवन का सबसे अटल सत्य है मृत्यु। यह वह अंतिम पड़ाव माना जाता है, जिसके बाद सांसारिक शरीर और उससे जुड़े सभी रिश्ते छूट जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब मृत्यु के समय आत्मा शरीर से बाहर निकलती है, तो सभी रिश्ते भी पीछे छूट जाते हैं। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या मृत्यु के बाद वास्तव में सभी रिश्ते टूट जाते हैं? क्या वास्तव में माता-पिता, संतान, पति-पत्नी, मित्र या प्रियजन से आत्मा का कोई संबंध शेष नहीं रहता है? इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर साधारण बुद्धि से पाना कठिन है, क्योंकि यह विषय केवल भौतिक संसार से नहीं, बल्कि आत्मा और अध्यात्म से जुड़ा हुआ भी है। ऐसे ही जाने माने संत प्रेमानंद जी महाराज से एक भक्तजन ने सवाल किया कि क्या वास्तव में मृत्यु के बाद सारे रिश्ते टूट जाते हैं, तो इस सवाल का उत्तर प्रेमानंद जी ने बड़ी ही सहजता से दिया है। आइए जानें इस बारे में उनका क्या कहना है।

क्या मृत्यु के बाद टूट जाते हैं सारे रिश्ते?

प्रेमानंद जी महाराज से एक भक्त ने जब प्रश्न किया कि क्या वास्तव में मृत्यु के बाद सारे रिश्ते टूट जाते हैं, तब इस प्रश्न का सही जवाब देते हुए उन्होंने बताया  कि यह सत्य है कि मृत्यु के बाद सारे रिश्ते टूट जाते हैं। वो बताते हैं कि जिस प्रकार से हम जब सो जाते हैं तब उसकी कोई स्मृति नहीं रहती है।

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ऐसे ही मृत्यु के बाद व्यक्ति गाढ़ निद्रा में चला जाता है और किसी भी प्रकार का किस से भी रिश्ता नहीं रह जाता है। स्वप्न की बात करें तो फिर भी आपके संस्कार स्वप्न में दिखाई दे सकते हैं, लेकिन मृत्यु वह सत्य है जिसके बाद व्यक्ति का न तो बैंक बैलेंस बचता है और न ही कोई रिश्ता, इसी वजह से कहा जाता है कि मृत्यु के बाद सारे रिश्ते खत्म हो जाते हैं।  

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रिश्तों का आधार ही है शरीर

जब हम इस संसार में जन्म लेते हैं तो माता-पिता से हमारा नाता जुड़ता है। धीरे-धीरे जीवन के सफर में मित्र, भाई-बहन, पति-पत्नी और संतान जैसे संबंध भी बनते जाते हैं। ये सभी रिश्ते हमारे शरीर और परिस्थिति के आधार पर बनते हैं। प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं जिस तरह से शरीर छूट जाता है, वैसे ही इन रिश्तों का बंधन भी समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि मृत्यु के बाद इंसान अकेला हो जाता है और केवल आत्मा की यात्रा ही आगे बढ़ती है।

 

 

 

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आत्मा शाश्वत सत्य है

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है 'न जायते म्रियते वा कदाचित्, नायं भूत्वा भविता वा न भूयः' अर्थात आत्मा न तो कभी जन्म लेती है और न ही कभी मरती है। आत्मा अविनाशी है। मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है, आत्मा का नहीं। इसलिए जब शरीर बदलता है तो उसके साथ जुड़े सभी रिश्ते भी छूट जाते हैं। हालांकि प्रेमानंद जी महाराज यह भी समझाते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्म और संस्कारों को साथ लेकर आगे बढ़ती है। कई बार यही कर्म उसे उन आत्माओं से फिर से जोड़ देते हैं जिनसे उसका गहरा संबंध रहा हो, लेकिन वहीं सत्य यह भी है कि मृत्यु के बाद आत्मा का किसी भी रिश्ते से कोई भी संबंध नहीं रह जाता है।

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