
Bail vs Release: लड़ाई-झगड़ा, हत्या या अन्य क्राइम के तहत आने वाले आरोपी को तय धारा के अनुसार सजा दी जाती है। साथ ही आरोप बड़ा होने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत जेल भी भेजा जाता है। हालांकि, कानूनी प्रक्रियाओं में रिहाई और जमानत दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें हम अक्सर सुनते हैं और कहीं न कहीं इन्हें एक ही समझ लेते हैं, लेकिन कानून की नजर में इनके मायने बिल्कुल अलग हैं। जब कोई व्यक्ति किसी अपराध के आरोप में पुलिस की गिरफ्त में होता है या जेल में होता है, तो उसे बाहर आने के लिए कानूनी रास्ता अपनाना पड़ता है।
आम बोलचाल में हम कहते हैं कि फलां व्यक्ति जेल से छूट गया है, पर वह छूटने का आधार क्या है, यह तय करता है कि वह रिहाई है या जमानत। इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील नीतेश पटेल से जानिए रिहाई और जमानत में अंतर क्या है?

जमानत को अंग्रेजी भाषा में बेल कहते हैं, जो एक अस्थायी व्यवस्था है। जब किसी व्यक्ति पर कोई आरोप लगता है और उसे गिरफ्तार किया जाता है, तो अदालत उसे कुछ शर्तों के साथ जेल से बाहर आने की अनुमति देती है।
जमानत मिलने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति निर्दोष साबित हो गया है। इसका मतलब सिर्फ यह है कि केस की सुनवाई के दौरान वह जेल के बाहर रह सकता है।
कोर्ट आमतौर पर जमानत के बदले कुछ पैसे या किसी व्यक्ति की गारंटी मांगता है, जिससे वह यह सुनिश्चित हो सके कि आरोपी सुनवाई के लिए कोर्ट में हाजिर होगा।
इसे भी पढ़ें- जानिए क्या होती है जीरो एफआईआर और कैसे दर्ज कराएं इसे
वहीं अगर कोई व्यक्ति जेल से बाहर रिहाई पर आता है, तो इसका मतलब उसे बाइज्जत बरी किया गया है। रिहाई एक स्थायी स्थिति होती है, जब अदालत किसी मामले की पूरी सुनवाई कर लेती है और इस नतीजे पर पहुंचती है कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
रिहा होने के बाद व्यक्ति को न तो कोर्ट में बार-बार हाजिरी लगानी पड़ती है और न ही उसे किसी गारंटी की जरूरत होती है। वह पूरी तरह स्वतंत्र होता है।

जमानत केस की सुनवाई के दौरान मिलती है। यह एक तरह की मोहलत है ताकि आरोपी अपनी पैरवी बाहर रहकर कर सके वहीं रिहाई केस के अंत में होती है, जब फैसला सुना दिया जाता है। हालांकि, कई बार पुलिस जांच में दोष न पाए जाने पर चार्जशीट दाखिल होने से पहले भी रिहाई हो सकती है।
जमानत पर बाहर आए व्यक्ति पर कई तरह की पाबंदियां होती हैं, जैसे वह शहर या देश छोड़कर नहीं जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि समय-समय पर पुलिस स्टेशन में हाजिरी देनी पड़ सकती है और गवाहों को प्रभावित नहीं करना होता।
अगर वह इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमानत रद्द कर उसे दोबारा जेल भेजा जा सकता है।
इसक उलट अगर कोई व्यक्ति रिहा होकर जेल से बाहर आया है, तो उस पर किसी भी प्रकार की कोई शर्त नहीं होती है क्योंकि कानून की नजर में वह उस अपराध से मुक्त हो चुका होता है।
इसे भी पढ़ें- क्या किसी कैंडिडेट पर FIR होने के बाद नहीं मिलती है उसे सरकारी नौकरी?
अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें। इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिंदगी के साथ
Image Credit- freepik
यह विडियो भी देखें
Herzindagi video
हमारा उद्देश्य अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी प्रदान करना है। यहां बताए गए उपाय, सलाह और बातें केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी तरह के हेल्थ, ब्यूटी, लाइफ हैक्स या ज्योतिष से जुड़े सुझावों को आजमाने से पहले कृपया अपने विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, [email protected] पर हमसे संपर्क करें।