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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता अपनी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में अक्सर इतने बिजी हो जाते हैं कि वे अपने बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। जब बच्चों को अपने माता-पिता का साथ और ध्यान नहीं मिलता, तो वे अक्सर चिड़चिड़े या बागी होने लगते हैं। कई बार माता-पिता इसे अनुशासन की कमी मान लेते हैं, जबकि यह तरीका होता है खुद की बातों को माता-पिता के सामने रखने का। ऐसे में इनके बारे में पता होना जरूरी है। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि क्वालिटी टाइम फॉर्मूला क्या है? जानते हैं इस लेख के माध्यम से...
बच्चे स्वभाव से अटेंशन के भूखे होते हैं। जब वर्किंग पैरेंट्स काम में बिजी होते हैं, तो बच्चों को महसूस होता है कि वे आपकी प्रायोरिटी नहीं हैं। जब उन्हें सीधे और सकारात्मक तरीके से आपका समय नहीं मिलता, तो वे 'नेगेटिव अटेंशन' पाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में वे आपकी बात नहीं मानते, सामान फेंकते हैं या चीखते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि ऐसा करने पर आप कम से कम उनसे बात तो करेंगे। माता-पिता की अनुपस्थिति में बच्चे खुद को सेफ महसूस नहीं करने लगते हैं, जिससे उनमें विद्रोह की भावना पैदा होती है।

ऐसे बच्चे अक्सर हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। उनमें एंग्जायटी और अकेलेपन का डर बढ़ सकता है, जिससे वे फ्यूचर में कटने लगते हैं। मानसिक तनाव बच्चों की नींद और भूख पर असर डालता है। कुछ बच्चे स्ट्रेस के कारण जंक फूड की ओर झुक जाते हैं या घंटों मोबाइल स्क्रीन के सामने बिताते हैं, जिससे उनमें मोटापे और आंखों की कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
रोज कम से कम 15 से 20 मिनट का समय ऐसा रखें जिसमें कोई फोन, लैपटॉप या टीवी न हो। इस दौरान सिर्फ बच्चे की बातें सुनें, उसे सलाह न दें।
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ऑफिस से आने के बाद बच्चे के साथ छोटे-छोटे काम करें, जैसे पौधों में पानी डालना या साथ में मेज सजाना। इससे उन्हें आपकी मौजूदगी का अहसास होता है।
जब बच्चा कुछ अच्छा करे, तो उसकी दिल खोलकर तारीफ करें। सकारात्मक प्रोत्साहन जिद को कम करने का सबसे बड़ा हथियार है।

जब बच्चा कुछ कहना चाहे, तो अपना काम छोड़कर उसकी आंखों में आंखें डालकर बात करें। इससे उसे सम्मान और प्यार महसूस होगा।
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