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पेरेंट्स यह शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे अपनी बात मनवाने के लिए रोने-धोने, खाना न खाने या जिद करने जैसे तरीके अपनाता है। इसे बोलचाल की भाषा में इमोशनल ब्लैकमेल कहा जा सकता है। ऐसे में एक पेरेंट होकर बच्चे की मासूमियत के आगे झुकना बेहद आसान है, लेकिन एक्सपर्ट के मुताबिक, हर बार उनकी बेमतलब की मांगें मानना उनके फ्यूचर के लिए नुकसानदेह हो सकता है। ऐसे में कुछ टिप्स से इस परिस्थिति से डील किया जा सकता है। ऐसे में इनके बारे में पता होना जरूरी है। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि आपका बच्चा ब्लैकमेल करे तो क्या करें। इसके लिए हमने कोच और हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट, साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। पढ़ते हैं आगे...
बच्चे स्वभाव से जिद्दी नहीं होते, बल्कि वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का तरीका बताते हैं। जब बच्चा ब्लैकमेल करता है, तो वह आपके लेवल को चेक कर रहा होता है। वह देखना चाहता है कि आप कितनी देर तक अपनी बात पर टिके रह सकते हैं। कई बार बच्चे ऐसा तब भी करते हैं जब उन्हें माता-पिता की अटेंशन नहीं मिलती। इसलिए, उनकी मांग को मना करने या गुस्सा करने के बजाय, यह समझने की कोशिश करें कि क्या वे अपनी बात कहने का सही तरीका नहीं जानते।

पेरेंटिंग का एक सबसे मुश्किल लेकिन जरूरी हिस्सा है बच्चों को 'ना' कहना। यदि बच्चे की कोई मांग गलत है, तो उसे साफ शब्दों में मना करें। यहां सबसे जरूरी बात यह है कि मना करने के बाद अपनी बात पर सटी रहें। अगर आप बच्चे के रोने या चिल्लाने के बाद हार मान लेते हैं और उसकी मांग पूरी कर देते हैं, तो बच्चा यह सीख जाता है कि 'रोने से काम बन जाता है'। शांत रहें और बच्चे को संदेश दें कि चिल्लाने या ब्लैकमेल करने से उसकी मांगें पूरी नहीं होंगी।
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जब बच्चा शांत हो जाए, तब उससे बात करें। उसे समझाएं कि अपनी बात रखने का सही तरीका क्या है। उसे बताएं कि "अगर तुम प्यार से अपनी बात कहोगे, तो मैं उस पर विचार करूंगी, लेकिन जिद्द करने पर बिलकुल नहीं।"

साथ ही, जब भी बच्चा किसी स्थिति में समझदारी दिखाए या बिना जिद्द किए आपकी बात मान ले, तो उसकी जमकर तारीफ करें। यह 'पॉजिटिव रीइन्फोर्समेंट' उसे सिखाएगा कि अच्छे व्यवहार से उसे ज्यादा प्यार और ध्यान मिलता है।
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