
महिलाओं को एक सुरक्षित माहौल, एक सेफ समाज देना शायद बहुत बेसिक जरूरत है, लेकिन अफसोस की बात है कि हम महिलाओं को इसे दे पाने में पूरी तरह से फेल हो चुके हैं। ऐसा मैं नहीं कह रही हूं, बल्कि ऐसा वो आंकड़े और हेडलाइंस कह रही हैं, जिन्हें न चाहते हुए भी हमें रोज देखना और सुनना पड़ता है और बतौर जर्नलिस्ट जिन्हें मुझ जैसी न जाने कितनी लड़कियों को कवर करना पड़ता है। इस बार दिल्ली से सटे गुरुग्राम में ऑटो रिक्शा से घर लौट रही नेपाली महिला के साथ तीन लोगों ने गैंगरेप किया। लड़की की उम्र 26 साल बताई जा रही है और वह एक प्राइवेट कंपनी में काम करती है। अभी कुछ दिन पहले ही गुरुग्राम में एक तीन साल की बच्ची संग हैवानियत की घटना सामने आई थी। इसके अलावा भी दिल्ली-एनसीआर में पिछले कुछ दिनों में कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जो महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़े करते हैं या यूं कहें कि महिला सुरक्षा के खोखले दावों की असलियत दिखाते हैं।

गुरुग्राम में एक नेपाली महिला के साथ तीन लोगों ने कथित तौर पर गैंगरेप किया। महिला का आरोप है कि ऑटो चालक समेत तीन लोगों ने उसके साथ रेप किया। उनसे अपनी शिकायत में कहा कि वह गुरुग्राम में अपने एक दोस्त से मिलने आई थी। कुछ कारणों के चलते उनसे शराब पी थी और वो नशे में थी। ऐसे में उसे सही से कुछ याद नहीं था। बताया जा रहा है कि पीड़िता एक ऐसे ऑटो में बैठ गई, जिसमें पहले से ही तीन लोग सवार थे। वो जब होश में आई, तो उसने खुद को एक कमरे में बंद पाया। उसने शिकायत में तीन पुरुशों पर गैंगरेप का आरोप लगाया है। फिलहाल ऑटो चालक को गिरफ्तार कर लिया गया है और बाकी आरोपियों की तलाश जारी है। इस मामले में महिला की भी काउंसलिंग करवाई जा रही है।

हर बार जब किसी बेटी के साथ दरिंदगी की कोई खबर सामने आती है, तो कुछ पल के लिए हम गुस्से से भर जाते हैं, सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड करता है, मोमबत्तियां जलाई जाती है और कड़े कानूनो की मांग उठती है, लेकिन आखिर में वहीं सवाल उठता है कि आखिर यह सब कब रुकेगा? एक तरफ हम चांद पर पहुंचने की बात करते हैं, डिजिटल इंडिया का जश्न मनाते हैं और खुद को विकसित देश कहने का दम भरते हैं, लेकिन दूसरी तरफ बेटियों को आज भी यह सिखाते हैं कि "रात में बाहर मत निकलो", "ज्यादा मत हंस", "कपड़े संभाल कर पहनो।" क्यों हर बार सुरक्षा का बोझ लड़की के कंधों पर डाल दिया जाता है? क्यों नहीं लड़कों को सिखाया जाता कि सम्मान क्या होता है, सहमति क्या होती है, इंसानियत क्या होती है?
महिला सुरक्षा केवल कानून से नहीं आएगी, यह असल में सोच बदलने से आएगी। जब तक घरों में बेटों को यह नहीं सिखाया जाएगा कि महिलाएं कोई वस्तु नहीं, बल्कि समान हक और सम्मान वाली इंसान है, तब तक आंकड़े बदलते रहेंगे, हकीकत नहीं। सवाल आज भी वहीं खड़ा है कि क्या हम सच में बदलाव चाहते हैं या बस अगली खबर का इंतजार?
महिलाओं के साथ हर दूसरे दिन इस तरह की दरिंदगी के मामले सामने आ रहे हैं और चीख-चीखकर ये कह रहे हैं कि किसी भी उम्र और किसी भी जगह पर महिलएं सुरक्षित नहीं हैं। समाज के तौर पर हमें शायद बहुत कुछ बदलने की जरूरत है तभी इस तरह के मामले रुकेंगे।
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