
"शक्ति का नाम ही नारी है।"
"नारी का जहां होता है सम्मान, वहीं बसते हैं भगवान।"
"नारी है तो कल है।"
"नारी के सपनों को उड़ान दो।"
Happy Women's Day
उफ्फ....कितना अच्छा लगता है न मैसेजेस को पढ़ना। Women's Day पर लगभग हर लड़की के इनबॉक्स में इस तरह के मैसेजेस की भरमार होती है। अचानक से हमें बताया जाता है कि कैसे हम दुनिया की धुरी हैं और कैसे ये दुनिया हमारे बिना अधूरी है। ऑफिस के ग्रुप्स हों, पर्सनल चैट्स हों या फैमिली व्हाट्सएप ग्रुप्स, इस तरह के मैसेजेस भर-भरकर हम तक पहुंचते हैं। हमारे आस-पास मौजूद हर शख्स इस खास दिन पर हमसे मिलते ही हमसे हाथ मिलाकर तो कभी गले लगाकर इस खास दिन की बधाई देता है और
इस बार भी देखिए Women's Day आ ही गया है और इस तरह के मैसेजेस आने की शुरुआत भी हो ही गई होगी और इस रविवार, 8 मार्च विमेंस डे के खास दिन ज्यादातर लोग जिस भी लड़की से मिलेंगे, उसे म तो जरूर कहेंगे। अब आप सोच रहे होंगे कि मैं बार-बार इस बात पर जोर क्यों दे रही हूं? आखिर ये तो अच्छी ही बात है न। एक लड़की होने के नाते मुझे तो ऐसे मैसेजेस पढ़कर या जब कोई इस तरह विश करे, तो अच्छा ही महसूस होना चाहिए, लेकिन माफ कीजिए एक लड़की होने के नाते ही मैं इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आपसे कहना चाहती हूं कि आप प्लीज इस साल मुझे Happy Women's Day मत कहिए और ऐसा सिर्फ मैं नहीं कह रही हूं, मेरी जैसी और भी कई लड़कियां हैं, जो इस विमेंस डे यही कह रही हैं कि उन्हें विश न किया जाए।

चलिए अब मैं आपको बता ही देती हूं कि आखिर में क्यों नहीं चाहती कि आप मुझे विश करें। देखिए बड़ी सीधी सी बात है महिला दिवस या विमेंस डे मनाया जाता है महिलाओं को सम्मान देने के लिए, उन्हें ये बताने के लिए कि वो कितनी खास हैं! इसी भावना के साथ अगर मुझ तक ये विशेज पहुंच रही होतीं, तो मैं बेहद खुश होती और लड़की होने पर गर्व भी महूसस करती, पर मैं ऐसा नहीं कर पा रही हूं क्योंकि मैं जानती हूं कि आप भले ही मुझे लंबे-लंबे मैसेजेस या कविताएं भेज दें, लेकिन असल में वो आपकी भावनाएं नहीं, बल्कि केवल फॉरवर्डेड मैसेज हैं, क्योंकि अगर वो आपकी भावनाएं होतीं, तो हर दूसरे दिन किसी नई बात पर मुझे आप जैसे ही किसी शख्स से ये नहीं सुनना पड़ता कि लड़की है...क्या ही कर लेगी?
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मुझे इसलिए आपकी बधाई नहीं चाहिए, क्योंकि अगर बधाई सच्ची होती, तो रोज रात को घर लौटते वक्त मुझे डर महसूस नहीं होता। अगर आपके लफ्जों में सच्चाई होती, तो हर दिन अखबार के पन्नों में रेप की हेडलाइंस नहीं होती। अगर आप सच्चे दिन और इरादे से मुझे विश कर रहे होते, तो प्रमोशन होने पर मुझे ऐसा सुनने को नहीं मिलता कि ये मुझे मेरी मेहनत के चलते नहीं, बल्कि किसी और वजह से मिला है।
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आकांक्षा एक 36 साल की महिला हैं और एक प्राइवेट कंपनी में काम करती हैं। उनका भी यही कहना है कि उन्हें हैप्पी विमेंस डे सुनना बिल्कुल नहीं पसंद। आकांक्षा का कहना है कि उन्हें बेशक अपने नारी होने पर गर्व है, लेकिन ये भी सच है कि अब उन्हें विमेंस डे मैसेजेस या किसी का विश करना पसंद नहीं आता, क्योंकि उनके साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसने उनकी नजर में समाज की सोच पर ही सवाल खड़े कर दिए। आकांक्षा कहती हैं, "जब मैं पहली बार मां बनीं, तो मैंने एक बेटी को जन्म दिया और बेटी के जन्म के बाद लोग बधाई तो दे रहे थे, लेकिन मानो दूसरी ही लाइन में मुझे ये सांत्वना दे रहे थे कि कोई बात नहीं, अगली बार बेटा हो जाएगा। खैर, तब मैंने लोगों की बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया पर जब 3 साल बाद मैं दोबारा प्रेग्नेंट हुई, तो पूरी प्रेग्नेंसी मेरे सास-ससुर, रिश्तेदार और यहां तक कि मेरे पति भी यही कहते रहे कि इस बात तो बेटा ही होना चाहिए और इसके बाद मेरे मन में ये सवाल उठा कि एक तरफ तो आप विमेंस डे पर महिलाओं को विश करते हैं, नवरात्रि में कन्या पूजन करते हैं और दूसरी तरफ घर में आपको बेटी नहीं, बेटा ही चाहिए।"

प्रीति एक हाउसवाइफ हैं और बरेली, उत्तरप्रदेश में रहती हैं। उनका कहना है कि उन्हें जब कोई विमेंस डे विश करता है, तो उन्हें खुशी नहीं मिलती, बल्कि गुस्सा और चिढ़ होती है। प्रीति की शादी हो चुकी है और वो एक बेटी और एक बेटे की मां हैं। उनका कहना है कि शादी से पहले या शादी के बाद न उन्हें खुद के लिए और न ही अपने बच्चों के लिए कोई फैसला लेने का हक मिला। एक बार उन्होंने इस बात पर गुस्सा जाहिर किया, तो उन्हें कहा गया, "लड़की हो, आवाज ऊंची मत करो।"
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डॉक्टर सोनू का भी कहना है कि इस विमेंस डे उन्हें हैप्पी विमेंस डे के मैसेजेस नहीं चाहिए। हमारा समाज जहां महिलाओं से जुड़े बेसिक मुद्दों को लेकर भी संवेदना और समझ नहीं है, वहां एक खास दिन पर विश करके क्या बदल जाएगा। एक डॉक्टर होने के नाते मैं कई पेशेंट्स और उनके परिवार से मिलती हूं और देखती हूं कि कैसे पीरियड्स हों, पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो या महिलाओं से जुड़ी कोई और बात, उसे काफी नॉर्मल मान लिया जाता है और उन्हें बस सब बर्दाश्त करने और फर्ज निभाने की सलाह दे दी जाती है।
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दिल्ली की निधि (बदला हुआ नाम) का कहना है कि विमेंस डे पर मैसेजेस भेजने का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक महिलाओं को बराबरी का हक न मिले, जब तक उन्हें घर की चाहरदीवारी में ही सम्मान न दिया जा रहा हो। निधि का कहना है कि पिछले कई महीनों से वो अपने तलाक का केस लड़ रही हैं। निधि का कहना है कि उनका पति उनके साथ घरेलू हिंसा करता था और कई बार उनके साथ गाली-गलौज भी की, लेकिन जब पहली बार उनके पति ने उन पर हाथ उठाया और उन्होंने इस बारे में अपने घर में बताया, तो उन्हें सुनने को मिला, "पति है...थप्पड़ मार भी दिया तो क्या हो गया?"
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आखिर में मैं यही कहना चाहूंगी कि प्लीज मुझे विमेंस डे विश मत कीजिए और अगर आप मुझे या और किसी भी लड़की को ये खास दिन विश करना चाहते हैं, तो पहले उन्हें वो समाज, वो भरोसा और वो इज्जत दीजिए कि वो आपकी बधाई को स्वीकार पाएं।
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Image Credit: Her Zindagi
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