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आज के समय में महिलाएं न केवल घर में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं बल्कि ऑफिस में भी एक बड़े पद पर काम करके नाम कमा रही हैं, साथ ही अच्छी खासी सैलरी भी पा रही हैं, लेकिन जब बात पर्सनल लाइफ के फैसलों की आती है, तो तस्वीर एकदम ही बदल जाती है। इसे ही आर्थिक आजादी बनाम मानसिक गुलामी कहा जाता है। महिलाएं पैसा तो कमा रही हैं, पर अपनी मर्जी से उसे खर्च करने या अपनी जिंदगी के छोटे-बड़े फैसले लेने के लिए आज भी परिवार या पति की परमिशन पर निर्भर हैं। इस विषय पर जब हमने अलग-अलग शहरों में रहने वाली कुछ महिलाओं के नजरिए और उनके साथ हुई घटनाओं को जाना और सुना तो समझ आया कि ये कड़वी हकीकत नहीं बदल सकती।
गाजियाबाद की सुरभि गुप्ता अपना बिजनेस रन कर रही हैं, लेकिन उनके घर में पैसों से जुड़े फैसलों की डोर उनके पति के हाथ में है। सुरभि अपनी पहले बड़े बोनस से अपने माता-पिता के लिए एक एयर प्यूरीफायर खरीदना चाहती थीं।
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जब उन्होंने यह बात घर पर कही, तो उनके पति ने साफ मना कर दिया और कहा कि यह पैसा घर के फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में जाएगा। सुरभि खुद कमाया हुआ पैसा भी अपनी मर्जी से खर्च नहीं कर पाईं।
सिकंद्राबाद की गौरी मिश्रा एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, पर उनकी तरक्की उनके घर की इजाजत की मोहताज है। हाल ही में गौरी को कंपनी की तरफ से दो महीने के लिए विदेश जाने का मौका मिला, जिससे उनका प्रमोशन तय था, लेकिन उनके ससुराल वालों ने यह कहकर मना कर दिया कि "पति के बिना औरत का इतने दिन घर से बाहर रहना ठीक नहीं।" आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद गौरी अपने करियर के लिए स्टैंड नहीं ले पाईं।
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फरीदाबाद की रहने वाली नेहा बंसल एक कॉलेज में प्रोफेसर हैं और ऑनलाइन क्लासेज देती हैं, लेकिन उनके पहनावे और सामाजिक मेलजोल का फैसला उनके ससुराल वाले करते हैं। नेहा को एक फंक्शन में अपनी पसंद की ड्रेस पहननी थी, लेकिन उन्हें मजबूरन वही पहनना पड़ा जो उनके सास-ससुर ने तय किया था। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने विरोध किया तो घर का माहौल खराब हो जाएगा। उनकी शिक्षा और पद उन्हें अपनी पसंद चुनने की हिम्मत नहीं दे पाए।
नोएडा की तनवी तिवारी एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती हैं, हालांकि वे वर्क फ्रॉम होम कर रही हैं, लेकिन वह अक्सर गिल्ट में डूबी रहती हैं। एक दिन तनवी को ऑफिस जाना पड़ा और मीटिंग के कारण देर हो गई।

घर पहुंचने पर उन्हें किसी ने डांटा तो नहीं, लेकिन उनके पति और बच्चों ने उनसे बात करना बंद कर दिया। यह मानसिक दबाव उन्हें यह अहसास कराने के लिए था कि वे एक अच्छी मां नहीं हैं। तनवी अब ऑफिस के काम से ज्यादा घर के काम का दबाव महसूस करती हैं ताकि कोई उन्हें टोक न सके।
ये चार उदाहरण बताते हैं कि मॉडर्न इंडियन वुमन भले ही आत्मनिर्भर है, पर वह इमोशनल कंट्रोल के जाल में फंसी है। समाज ने उसे कमाने की इजाजत तो दे दी, लेकिन पिछड़ी सोच को बदलने की आजादी उसे आज भी नहीं मिली है।
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