
पहले पार्ट में आपने पढ़ा कि आंचल को बस में कुछ अजीब लग रहा था लेकिन उसकी आंखें खोलकर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी। आंचल कैसे भी करके बस से उतरना चाहती थी। डर के कारण उसके हाथ-पैर कांप रहे थे, माथे से उसे पसीना भी टपक रहा था। आंचल ने मन ही मन सोच लिया था कि आज उसके साथ पक्का कुछ बहुत ज्यादा बुरा होने वाला है। सोचते-सोचते आंचल के मन में आया कि एक बार आंखें खोलकर देखना चाहिए। उसने बड़ी हिम्मत करके आखें खोली और नजारा देखकर उसके पैरों से जैसे जमीन ही खिसक गई। डर के मारे आंचल और भी घबरा गई थी और अब तो उसकी सांस भी फूलने लग थी।
चमचमाती बस एक खंडहर में बदल गई थी। शीशे टूटे हुए थे और पूरी बस में जंग लगा हुआ था। ऐसा लग रहा था, जैसे बस सालों पुराने किसी खंडहर से उठकर आई है। बस की सीटें फटी हुई थी और सबसे ज्यादा हैरानी वाली बात यह थी कि बस में कोई भी महिला जिंदा नहीं लग रही थी। बस में चढ़ते हुए जिस तरह से महिलाओं के कपड़े और हुलिया था, वह अब भूतिया चेहरे में बदल गया था। कपड़ों पर खून के निशान थे और उनके पैर भी उल्टे थे। अभी आंचल धीरे-धीरे नजरे घुमाकर देख ही रही थी, तभी एक महिला से उसकी नजर मिल गई। महिला की आंखे जैसे ही आंचल से मिली वह मुस्कुराई और तुरंत उड़कर उसके पास आने लगी। उसे देखते ही आंचल कसकर अपनी आंखे दबा ली और ऐसे रिएक्ट करने लगी, जैसे उसने कुछ नहीं देखा है।
आत्मा, आंचल के कानों के पास आकर फुसफुसा रही थी- तूने मुझे देखा..तूने मुझे देखा…तूने मुझे देखा..

महिला की डरावनी आवज सुनकर आंचल के माथे से लगातार पसीना टपक रहा था, लेकिन उसने बिलकुल भी रिएक्ट नहीं किया। इतना ही नहीं, सब कुछ नॉर्मल करने के लिए आंचल गाना भी गुनगुनाने लगी…
आंचल को इतना नॉर्मल देखकर महिला को लगा कि शायद उसने नहीं देखा, इसलिए वह इतनी नॉर्मल है। इसलिए, वह वापस आकर आगे सीट पर बैठ गई। आत्मा को अपने से दूर जाते देख, आंचल ने चैन की सांस ली, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे अपनी जान बचाए।
लगातार टाइम बीत रहा था और उसे बचने का कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा था, तभी आंचल का फोन बजा। फोन बजते ही आंचल घबरा गई और फौरन फोन साइलेंट करने के लिए बैग में हाथ मारने लगी। जैसे ही उसकी आंखें खुली, बस में बैठी सभी आत्माएं उसके सिर के पास आकर उड़ने लगी। ऐसा लग रहा था कि जैसे ही आंचल सिर उठाएगी, वह आत्माएं उसे दबोच लेंगी, लेकिन आंचल ने भी बड़ी चालाकी से फोन काटा और नाटक धीरे से बोलते हुए नाटक किया। फोन को साइलेंट कर देती है, सब सो रहे हैं और फोन आने की वजह से सबको बार-बार डिसटर्ब होगा।

आंचल ने फोन काटा और सिर ऊपर उठाते हुए अपनी आंखे फिर से बंद कर ली। कान में ईयरफोन लगा ही था और मन ही मन गाने को गुनगुनाने लगी। आंचल की आंखें बंद थी, इसलिए किसी भी आत्मा ने उसे हाथ नहीं लगाया। आंचल समझ गई कि जब तक वह उनकी तरफ देखेगी नहीं, तब तक उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ने वाला, लेकिन वह कब तक ऐसे ही बस में बैठे रहेगी।
तभी साथ में बैठी आत्मा ने आंचल के कान में कहा- तुम नहीं बच सकती। तुम ये नाटक ज्यादा देर तक नहीं कर पाओगी। आत्मा की बात सुनकर आंचल का दिल अब और भी तेज-तेज धड़कने लगा था। उसे समझ आ गया था कि साथ में बैठी आत्मा को पता है कि वह सब कुछ देख चुकी है।
साइड की सीट पर बैठी आत्मा ने फिर आंचल के कान में कहा- तुमने उसे देखा था…मुझे पता है तुम सब कुछ देख चुकी हो, लेकिन तुम यहां से बचकर नहीं जा पाओगी। कब तक तुम ऐसे ही बैठी रहोगी। तुम सोच भी नहीं सकती, हम तुम्हारे साथ क्या कर सकते हैं?
आत्मा की आवाज जैसे आंचल के कानों में गूंजती रह गई- तुम अब यहां से बचकर नहीं जा सकती…आंचल का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलीं, लेकिन बाहर का नजारा देखकर उसकी सांसें थम गईं। बस की खिड़की के बाहर न कोई सड़क थी, न कोई शहर… बस घना अंधेरा और धुंध, जैसे बस किसी और ही दुनिया में चल रही हो।

आंचल डर रही थी, लेकिन वह उससे सवाल करना चाहती थी आखिर उसने उनका क्या बिगाड़ा है। वह उसे जाने दे, क्यों वह उसे मारना चाहते हैं। आंचल के मन में सवाल कई थे, लेकिन पूछने के लिए उसके पास हिम्मत नहीं थी, तभी आंचल ने अपने बैग में हाथ डाला।
साइड में बैठी आत्मा का ध्यान उसके हाथ की तरफ था, आंचल ने बैग में से एक पेपर और पैन निकाला और उसपर लिखा- प्लीज मुझे जाने दो……
पेपर जैसे ही उसने साइड में रखा, वह अपने आप ही हवा में उठ गया। आत्मा ने उसे पढ़ा और तेज -तेज हंसने लगी, उसके हंसते बस में सभी आत्माओं के हंसने के आवाज आने लगी, लेकिन केवल आंचल ही एक थी, जो चुपचाप बस कान में ईयरफोन लगाकर सोने का नाटक कर रही थी।
कुछ ही सेकंड बाद पूरी बस में सन्नाटा छा गया। फिर आत्मा धीरे-धीरे उसके और करीब आ गई। उसका चेहरा अब आंचल के बिल्कुल सामने था- ठंडा, फीका और डरावना।
वह आंचल को घूरते हुए बोली- तूझे बचकर जाना है यहां से? कोशिश करके देख ले..उसके चेहरे पर हंसी थी, ऐसा लग रहा था जैसे वह उसके साथ खेल खेलना चाहती है।
आंचल ने बिना आंखें खोले हां में सिर हिलाया। आत्मा फिस मुस्कुराई और बोली- तो फिर तो आंखें खोलनी होगी। बिना आंखें खोले, तू बाहर कैसे जाएगी।
ये सुनते ही आंचल ने तुरंत घबराते हुए ना में सिर हिलाया और इयरफोन का बटन दबाते हुए गाने की आवाज तेज कर दी। उसे समझ आ गया कि यहां उसकी कोई मदद नहीं करने वाला है। वह किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकती। आंचल का गला सूख गया था। उसकी उंगलियां कांप रही थीं, लेकिन उसने धीरे-धीरे अपनी मुट्ठियां कस लीं।
कुछ देर शांती से बैठने के बाद आंचल मन ही मन सोच रही थी कि कैसे इस बस से बाहर निकल जाए। वह उस सीट से हटकर पीछे वाली सीट पर जाना चाहती थी। कोने वाली सीट पर कोई नहीं बैठा था। आंचल ने सोचा कि वह खिड़की से कूद जाएगी, लेकिन उस खिड़की तक पहुंचना आसान नहीं था।
बहुत सोचने के बाद आंचल को आइडिया आया। उसने अपने बैग से फोन निकाला और धीरे से पीछे वाली सीट के पास गिरा दिया। फोन गिराते ही नीचे देखकर बोली, मेरा फोन- मेरा फोन।
कहां गिर गया मेरा फोन। वह सीट से ऊठकर नीचे बैठ गई और आस-पास फोन ढूंढने का नाटक करने लगी। उसने एक बार भी अपना सिर और आखें ऊपर नहीं की और पीछे की सीट पर जाते ही तुंरत फोन उठाकर सीट पर बैठ गई। सीट पर बैठकर उसने अपनी नजर पर्स की तरफ की और धीरे से बोली, यहीं बैठ जाती हूं, सीट तो खाली ही है और नाटक करते हुए उसने कान में फिर से ईयरफोन लगाया और आंखें बंद कर ली।
अब उसे कैसे भी करके बस से कूदना था। वह समझ गई थी कि बस से जैसे ही वह बाहर निकलेगी, सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन यह कैसे होगा, उसे नहीं पता था।
चल ने आंखें बंद रखीं, लेकिन उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था। बस से कूदना है… बस से कूदना है…यही एक बात उसके दिमाग में बार-बार घूम रही थी।
उसने थोड़ी सी अपनी आंख खोली, लेकिन आगे की सीट पर बैठी आत्मा उसकी तरफ मुंह करके बैठी थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें। उसके दिमाग में फौरन एक आइडिया आया। उसने बिना देर किए…धीरे से अपने हाथ को पर्स के अंदर डाला और इस बार फोन नहीं बल्कि पानी की बोतल को बाहर निकाला।
वह ढक्कन खोलकर पानी पीने जा रही थी, लेकिन तभी ढक्कन हाथ से गिर गया और नीचे गिर गया। आंचल ने यह जानकर किया था, ताकि सभी का ध्यान बोतल के ढक्कन पर जाए। आंचल को पता था की आत्माओं को लगेगा कि मैं अब नीचे झूककर ढक्कन उठाऊंगी, इसलिए सभी सीट के नीचे आकर बैठ गए।
जैसे ही सभी आत्माएं एक जगह इकट्ठा हुई, आंचल ने मौका देखा और तुरंत खिड़की से बाहर छलांग लगा दी। छंलाग लगाते ही एक आत्मा ने उसका पैर पकड़ लिया, आंचल तभी अपनी आंखें बद कर ली और पानी की छीटें आत्मा के ऊपर मारी। पानी पड़ते ही आत्मा के हाथ से आंचल का पैर छूट गया और आंचल सड़क पर जा गिरी।

सड़क पर गिरते ही आंचल बेहोश हो गई, तभी कुछ ही समय बाद आवाज आई, आंचल ऑफिस नहीं जाना है क्या, लेट हो रहा है। आंचल ने मन ही मन सोचा, ये तो मां की आवाज थी…कोई दरवाजा खटखटा है और तभी वह जाग गई। आंचल ने खुद को कमरे में पाया, ऐसा लगा जैसे वह सपना देख रही है। उसने चिल्लाते हुए कहा- हां मां आ रही हूं। आंचल को भरोसा नहीं हो रहा था कि यह एक सपना था। उसके कपड़े पसीने से भीगे हुए थे, वह उसी कपड़ों में थी, जो उसने बस में पहना हुआ था, आंचल के शरीर में भी बहुत ज्यादा दर्द हो रहा था। आंचल ने तभी फौरन उठकर अपना पर्स चेक किया। पर्स में फोन, ईयरफोन और सारा सामान था, लेकिन तभी उसकी नजर बोतल पर पड़ी। बोतल का ढक्कन गायब था, ये देखकर आंचल हैरान रह गई, उसने अपने पैरों की तरफ देखा, तो उसके पैरों पर नाखुनों के निशान थे।
आंचल को समझ आया कि यह कोई सपना नहीं था, यह सच में उसके साथ हुआ था, लेकिन वह इस बात को किसी को बता नहीं सकती थी, क्योंकि कोई उसपर भरोसा नहीं करने वाला। आंचल चैन की सांस ली और मां से कहा- मां आज मेरा ऑफिस जाने का मन नहीं, मैं आपके साथ ही रहूंगी। मां ने भी मुस्कुराते हुए कहा- चलो कभी तो तुमने छुट्टी के बारे में सोचा।
यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।
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