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Maa Kalratri Vrat Katha 2026: गधे की सवारी और बिखरे बाल करती हैं शत्रुओं का नाश, यहां पढ़ें मां कालरात्रि की पौराणिक कथा

चैत्र नवरात्रि के 9 दिनों में माता के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है। सातवें नवरात्रि में मां कालरात्रि की आराधना की जाती है, ताकि आपके जीवन में सकारात्मकता बनी रहे। इस दिन आप मां कालरात्रि की व्रत कथा भी जरूर पढ़ें।
Editorial
Updated:- 2026-03-25, 06:10 IST

चैत्र नवरात्रि का हर दिन खास होता है। इन दिनों में माता के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है। साथ ही व्रत कथा जरूर पढ़ी जाती है, ताकि माता के उस स्वरूप के बारे में हम जान सकें। नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि का पूजन होता है। ऐसे में इनकी व्रत कथा का वर्णन भी आपको जरूर करना चाहिए, ताकि आपके जीवन में सकारात्मकता बनी रहे। आइए बताते हैं माता की कौन सी कथा को आप सातवें नवरात्रि में जरूर पढ़ें।

मां कालरात्रि की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में शुंभ और निशुंभ नाम के दो अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर दैत्य थे। उन्होंने अपनी आसुरी शक्ति के बल पर स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया और इंद्र समेत सभी देवताओं को पराजित कर दिया। स्वर्ग का अधिकार छिन जाने और असुरों के अत्याचार से त्रस्त होकर सभी देवता हिमालय पर्वत पर गए और भगवान शिव व माता पार्वती की शरण ली। जब माता पार्वती ने देखा की देवता बेहद परेशान हैं, तो ऐसे में उन्होंने रौद्र रुप धारण किया और असुरों का वध करने के लिए युद्ध में कूद पड़ी।

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रक्तबीज के रक्त से बढ़ेगा असुरों का राज

शुंभ-निशुंभ ने अपने सबसे भयंकर सेनापति रक्तबीज को युद्ध के मैदान में भेजा। ऐसा इसलिए क्योंकि रक्तबीज को ब्रह्मा जी द्वारा एक वरदान प्राप्त हुआ था कि उसके शरीर से रक्त की एक-एक बूंद जब धरती पर गिरेगी तो इससे दोबारा रक्तबीज उत्पन्न हो जाएगा। जब माता रक्तबीज से युद्ध कर रही थी, तो उन्होंने उसपर प्रहार किया। उसके शरीर के जिस हिस्से पर प्रहार हुआ वहां से रक्त निकला और जमीन पर गिरा, जिससे कई सारे रक्तबीज उत्पन्न हुए। युद्ध में स्थिति इतनी भयभीत हो गई की सभी देवता डर गए की माता इनका सामना कैसे करेंगी?

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मां ने लिए कालरात्रि रूप

जब मां को रक्तबीज का अंत असंभव नजर आता, तब मां दुर्गा ने योगमाया को प्रकट किया। इसी शक्ति को मां का सातवां रूप मां कालरात्रि कहा जाता है। बाल बिखरे हुए और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला थी। उनके तीन नेत्रों से अग्नि की ज्वाला निकल रही थी और उनकी सांसों से भयंकर लपटें उठ रही थीं। इसके बाद मां ने रक्तबीज का वध करना शुरू किया। जब भी वो उसपर वार करती, तो उसका रक्त वो पी लेती थी। इससे नए रक्तबीज बनने बंद हो गए। अंतः में रक्तहीन होकर महाबली रक्तबीज जमीन पर गिर पड़ा और उसका अंत हुआ। इसके बाद देवी ने शुंभ और निशुंभ का भी वध कर तीनों लोकों को उनके आतंक से मुक्त कराया।

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इस कथा को पढ़ने से आपको इस बात का पता चलता है कि बुराई कितनी भी बड़ी हो, एक दिन उसका अंत जरूर होता है। जैसे की रक्तबीज और शुंभ निशुंभ का हुआ। आप भी माता की आरती से पहले इस कथा को जरूर पढ़ें।

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Image credit- Freepik/ Shutterstock

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