what does it mean if someone is spiritual

आप धार्मिक हैं या आध्यात्मिक? जानें इनके बीच का अंतर

बता दें कि किसी भी व्यक्ति के धार्मिक होने और उसके आध्यात्मिक होने में बहुत अंतर होता है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं बल्कि शास्त्रों में आध्यात्मिक और धार्मिक होने के बीच का अंतर विस्तार के साथ बताया गया है।
Editorial
Updated:- 2025-04-11, 13:59 IST

हम में से बहुत से लोग धार्मिक होंगे तो बहुत से लोग आध्यात्मिक होंगे। अब आप कहेंगे कि दोनों में अंतर क्या है तो बता दें कि किसी भी व्यक्ति के धार्मिक होने और उसके आध्यात्मिक होने में बहुत अंतर होता है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं बल्कि इस बारे में हमें ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स ने बताया। साथ ही, शास्त्रों में आध्यात्मिक और धार्मिक होने के बीच का अंतर विस्तार के साथ बताया गया है। तो चलिए इसी कड़ी में जानते हैं कि धार्मिक होने और आध्यात्मिक होने में क्या अंतर होता है।

किसी व्यक्ति के धार्मिक होने का क्या मतलब है? (Kisi Vyakti Ke Dharmik Hone Ka ya Matlab Hai?)

adhyatmik hona dharmik hone se kaise alag hai

शास्त्रों के अनुसार, किसी व्यक्ति के धार्मिक होने का मतलब होता है कि धर्म के साथ सांसारिक कर्म। यानी कि व्यक्ति धार्मिक गतिविधियां करता है लेकिन उसके साथ उसके सांसारिक कर्म भी शामिल होते हैं।

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उदाहरण के तौर पर, अगर कोई व्यक्ति धार्मिक है तो उसका अर्थ है कि वह पूजा-पाठ भी करेगा, दान-पुण्य भी करेगा जो धर्म के अंतर्गत आता है और वह सांसारिकता भी निभाएगा जैसे कि अच्छे कर्म करेगा।

पूजा-पाठ के साथ-साथ दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना, किसी की मदद करना, किसी के साथ बुरा न करना और न ही सोचना, अपने कर्म अपने विचार आदि को सकारात्मक रखना अपने एवं दूसरों के प्रति।

dharmik aur adhyatmik hone mein kya antar hai

किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक होने का क्या मतलब है? (Kisi Vyakti Ke Adhyatmik Hone Ka ya Matlab Hai?)

किसी भी व्यक्ति के आध्यात्मिक होने का अर्थ है कि वह पूर्णतः धार्मिक कार्यों में लीन है उसे संसार की किसी भी गतिविधि में कोई रूचि नहीं है, वह पूरी तरह से भगवान के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुका है।

इसका सीधा और सरल उदाहरण है कि जितने भी असली साधु-संत हैं जो भगवत मार्ग पर चलते हैं वह आध्यात्मिक हैं जबकि गृहस्थ लोग धार्मिक कहलाते हैं क्योंकि वह सांसारिकता से भी जुड़े हुए हैं।

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हां, आध्यात्मिक वह भी कहलायेंगे जो साधु-संत नहीं हैं लेकिन कहीं न कहीं उसी मार्ग पर हैं उन्होंने सांसरिक रिश्तों को छोड़ दिया है और भगवान की प्राप्ति के लिए उनके चरणों में खुद को समर्पित किया हुआ है।

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