
हिंदू धर्म में पूरे साल कई तरह के व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं जिनका अलग महत्व होता है। इनमें से मकर संक्रांति विशेष महत्व रखता है। इस दिन का महत्व इसलिए भी बहुत ज्यादा होता है क्योंकि इसी दिन सूर्य का गोचर धनु राशि से मकर राशि में होता है और वो उत्तरायण हो जाते हैं। वैसे तो सूर्य हर महीने अपनी राशि का परिवर्तन करते हैं, लेकिन मकर राशि में सूर्य का गोचर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। हर साल माघ महीने की संक्रांति तिथि को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है और यह जनवरी में 14 या 15 तिथि को पड़ती है। इस तिथि से जुड़े कुछ रहस्यों में से एक यह भी है कि महाभारत युद्ध के दौरान भीष्म पितामह ने घायल होने के बाद भी अपने प्राण नहीं त्यागे और अपनी इच्छा मृत्यु के लिए मकर संक्रांति का इंतजार किया जब सूर्य उत्तरायण हो गए। आइए जानें इस दिन का क्या रहस्य था और भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिए इसी दिन को क्यों चुना था।
भारत की विविधता मकर संक्रांति के पर्व में भी देखने को मिलती है और इसे देश में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। केरल और तमिलनाडु में इसे पोंगल कहा जाता है, कर्नाटक में संक्रांति के नाम से जाना जाता है, हरियाणा में माघी कहा जाता है, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण और उत्तराखंड में उत्तरायणी नाम से जाना जाता है। यही नहीं उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे खिचड़ी या संक्रांति के नाम से जाना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब कोई ग्रह एक राशि से निकलकर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उसे संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य के दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर गमन करने को उत्तरायण कहा जाता है। शास्त्रों में उत्तरायण काल को अत्यंत शुभ माना गया है और ऐसी मान्यता है कि यदि किसी इस अवधि में कोई काम किया जाता है तो उसमें सफलता जरूर मिलती है। यही नहीं शास्त्रों में इस बात का जिक्र भी है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु मकर संक्रांति के दिन होती है तो उसे मोक्ष अवश्य मिलता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण के समय प्राण त्याग करने वाले व्यक्ति को जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है और वह सीधे मोक्ष को प्राप्त होता है। इसी वजह से उत्तरायण काल को किसी व्यक्ति की मृत्यु के लिए भी बहुत शुभ माना जाता है। इसी मान्यता से जुडी है महाभारत में भीष्म पितामह की मृत्यु से जुड़ी कहानी जिसमें उन्होंने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने का समय ही चुना था।
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महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे थे। युद्ध के दौरान अर्जुन ने उन्हें अनेक बाणों से घायल कर दिया। इन बाणों से घायल होकर भीष्म पितामह धरती पर गिर पड़े, लेकिन उनकी मृत्यु नहीं हुई। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था और यह वरदान भीष्म पितामह को उनके पिता राजा शांतनु ने दिया था।

इस वरदान की वजह से ही वो अपनी मृत्यु अपनी इच्छा से प्राप्त कर सकते थे। इसी वजह से उन्होंने तुरंत प्राण नहीं त्यागे। जब अर्जुन के बाणों से भीष्म पितामह घायल हुए, उस समय सूर्य दक्षिणायन थे। भीष्म पितामह की इच्छा थी कि वे अपने प्राण सूर्य के उत्तरायण होने पर ही त्यागें। इसलिए बाणों की शय्या पर 58 दिनों तक लेटने के बाद उन्होंने मकर संक्रांति के दिन सूर्य के उत्तरायण होने के बाद ही अपने प्राण त्यागे। शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि 6 महीने जब सूर्य उत्तरायण होते हैं उस समय यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तब उसे मोक्ष मिलता है।
भीष्म पितामह का 58 दिनों तक बाणों की शय्या में लेटे रहना उनके धैर्य का ही प्रतीक था और मोक्ष प्राप्ति की इच्छा से ही उन्होंने मृत्यु के लिए इस दिन को चुना था। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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