
कभी पीरियड्स, तो कभी मेंस्ट्रुअल साइकल के नाम से हर महीने लड़कियों के जीवन में आने वाली ये प्रक्रिया जितनी स्वाभाविक है, लोग उतना ही इसके बारे में आज भी बात करने से डरते हैं। यूं कहा जाए कि हमारे समाज में आज भी लड़कियां न तो इसके बारे में खुलकर बात कर पाती हैं और न ही मेंस्ट्रुअल हाइजीन के बारे में समझ पाती हैं। कई बार उनकी नासमझी बीमारियों का कारण भी बन जाती है। आज भी देश में माहवारी को लेकर न केवल चुप्पी है, बल्कि इससे जुड़ी जरूरतों और समस्याओं को भी अक्सर नजरअंदाज भी किया जाता रहा है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए 30 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए सैनिटरी पैड को हर स्कूल में फ्री में उपलब्ध कराने का फैसला लिया है। आइए जानें क्या है पूरी खबर।
छात्राओं के स्वास्थ्य, सम्मान और समानता के अधिकार को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया कि मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। इस फैसले के तहत सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए इस बात के निर्देश दिए हैं कि वो सरकारी और निजी, दोनों प्रकार के स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराएं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी अनिवार्य किया है कि देश के हर स्कूल में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग वॉशरूम सुविधाएं हों, जिनमें पानी और स्वच्छता की अच्छी व्यवस्था हो। साथ ही दिव्यांग छात्रों के लिए सुलभ शौचालय भी होने जरूरी हैं। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर एक बड़ा निर्णय देते हुए यह भी कहा है कि यदि कोई सरकारी या प्राइवेट स्कूल इस बात का उल्लंघन करेगा तो उसकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।

अपने फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि मेंस्ट्रुअल हाइजीन स्वास्थ्य संविधान द्वारा प्रदान किए जाने वाले जीवन के अधिकार के अंतर्गत आता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि, "संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार शामिल है। सुरक्षित, प्रभावी और किफायती मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों तक पहुंच एक बालिका को स्वास्थ्य के उच्चतम स्तर को प्राप्त करने में मदद करती है" सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी, 2026 को इस बात को घोषणा की है कि सभी शिक्षण संस्थानों में मेंस्ट्रुअल हाइजीन आर्टिकल 21 के तहत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
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सुप्रीम कोर्ट के सामने एक अहम सवाल यह था कि क्या स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय और मासिक धर्म के दौरान इस्तेमाल होने वाले सैनिटरी उत्पादों की कमी को शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी देखा कि खराब बुनियादी ढांचा और जरूरी सुविधाओं की कमी की वजह से कई लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है या वो कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाती हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई और भविष्य के अवसरों पर पड़ता है। लड़कियों को मासिक स्वच्छता से जुड़ी सुविधाएं न देना उनके सम्मान को ठेस पहुंचाता है। अदालत ने कहा, “मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता सुविधाओं की कमी एक बच्ची की गरिमा को प्रभावित करती है, क्योंकि गरिमा का मतलब ऐसा जीवन है जिसमें अपमान, बहिष्कार या अनावश्यक पीड़ा न हो।” फैसले में इस बात पर जोर दिया कि गरिमा संविधान का एक मूल मूल्य है और इसे खासतौर पर बच्चियों के मामले में हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

छात्राओं के स्वास्थ्य से जुड़े आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर सरकार स्कूली छात्राओं को टॉयलेट और मुफ्त सैनेटरी पैड नहीं देती है, तो उन्हें भी इसका जवाब देना पड़ेगा। वरिष्ठ न्यायाधीश जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कक्षा 6 से 12 तक की सभी छात्राओं के लिए सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे देश में लागू करने पर यह आदेश दिया है। यह फैसला सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की याचिका पर सुनाया गया है।
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वास्तव में यह सुप्रीम कोर्ट का मेंस्ट्रुअल हाइजीन को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला है जिसका पालन करना हर स्कूल के लिए जरूरी होगा। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसे ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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