
Rhetoric Against Supreme Court: इन दिनों सुप्रीम कोर्ट वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर समीक्षा कर रहा है। बीते शनिवार न्यायपालिका को लेकर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने जो कमेंट किया था, उसे लेकर अब विवाद शुरू हो चुका है। निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कहा कि न्यायलय अपनी सीमाओं से बाहर जाकर फैसले कर रहा है। उन्होंने कहा कि कोर्ट देश की संसद को दरकिनार कर है। सासंद ने इसके अलावा भी सुप्रीम कोर्ट को लेकर काफी कुछ कहा है।
ऐसे में सवाल यह बनता है कि क्या कोई भी सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बोल सकता है? अगर कोई सुप्रीम के खिलाफ कोई बोलता है, तो उसे क्या सजा मिलती है? सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बोलने वालों पर कौन कार्रवाई करता है?
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सुप्रीम कोर्ट को लेकर बात की जा सकती है, लेकिन सीमाओं में रहकर। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। हालांकि, स्वतंत्रता पूर्णं रूप से नहीं है। इसमें कुछ सीमाएं भी हैं। आप सुप्रीम कोर्ट के लिए भड़काऊ भाषण या अपमानजनक बयानबाजी नहीं कर सकते। यह कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है। आप सुप्रीम कोर्ट के काम की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन सीमाओं में रहकर।
स्वतंत्रता कभी भी पूर्ण रूप से नहीं मिलती है। संविधान के अनुच्छेद 19(2) में स्वतंत्रता को लेकर कुछ प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। यदि कोई शख्स सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी करता है या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डालता है या कोई समुदाय विशेष के खिलाफ लोगों को भड़काता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यदि कोई सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अपमानजनक बयान देता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। खासतौर पर तब जब कोई अदालत की अवमानना करता है या जजों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है।

सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बोलने के और उनके फैसले की आलोचना करने का जनता के पास लोकतांत्रिक अधिकार होता है। हालांकि, शर्त ये है कि आलोचना उचित और रचनात्मक होनी चाहिए। इसके साथ ही इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। यदि आलोचना अपमानजनक, झूठी या फिर भड़काऊ होती है, तो आपको सजा भी मिल सकती है।
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