
कहते हैं कि वक्त के हिसाब से दुनिया बदल जाती है, बात पूरी तरह सही भी है। घर से लेकर बाहर तक, बदलते वक्त के साथ हमारी जिंदगी में कई बदलाव आते हैं। आज देखिए हम चांद पर पहुंच चुके हैं, मंगल पर बस्ती बनाने के सपने देख रहे हैं और AI की महिमा तो अब हर जगह नजर आने लगी है। कुल मिलाकर बदलते वक्त के साथ सब कुछ बदलता जा रहा है, लेकिन एक बात ऐसी है जिसमें बदलाव आना अभी बाकी है। हम बात कर रहे हैं उस सोच की, जिसका कहना है कि घर का काम सिर्फ महिलाओं की ड्यूटी है। बेशक महिलाएं बाहर जाकर नौकरी कर रही हैं, कमाई कर रही हैं, अपने सपने पूरे कर रही हैं, लेकिन इस सब के बीच घर-गृहस्थी चलाने की जिम्मेदारी तो उनके सिर पर ही है।
मैं ये नहीं कह रही हूं कि इस सोच में बिल्कुल बदलाव नहीं आया है, लेकिन उतना नहीं आया है, जितना आना चाहिए था। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान साफ कहा कि खाना बनाना-कपड़े धोना सिर्फ पत्नी नहीं, बल्कि पति की भी जिम्मेदारी है। पत्नी नौकरानी नहीं, बल्कि जीवनसाथी होती है और ऐसे में घर के कामों की जिम्मेदारी दोनों की होती है। इसके बाद देखना ये होगा कि क्या समाज की ये सोच बदल पाती है कि बहू चाहे चांद पर जाए पर चार रोटी बनाकर जाए?

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने एक वैवाहिक विवाद मामले की सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में कहा कि घर के काम करना, गृहस्थी संभालना, सास-ससुर का ख्याल रखना और बच्चों को संभालना केवल पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पति को भी इसमें बराबर का साथ देना होगा। आज वक्त बदल चुका है और ऐसे में पति को ये समझना होगा कि आप किसी नौकारीन से शादी नहीं कर रहे है बल्कि आपकी पत्नी आपकी जीवनसाथी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी घरेलू कामकाज नहीं कर रही है, तो इसे क्रूरता नहीं माना जा सकता है। बता दें कि ये मामला एक वैवाहिक विवाद का था। दोनों पक्षों की शादी साल 2017 में हुई थी और तलाक की सुनवाई हो रही थी।

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी बेशक सराहनीय है और आज के वक्त में उन लोगों की सोच पर सीधा तमाचा है, जो अभी भी यही मानते हैं कि घर के काम करना सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी है। एक महिला जो पूरे दिन ऑफिस का काम करके घर पहुंचती है, लेकिन दो पल आराम मिलने के बजाय घर पहुंचते ही उससे घर के काम करने की उम्मीद की जाती है, उसे एक सुपरवुमेन मान लिया जाता है, जो न थकती है और न ही उसे घर के काम में किसी मदद की जरूरत है। आज वक्त बदल गया है और अब जरूरी है कि ये सोच भी बदल जाए। पति की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो घर के कामों में पत्नी का बराबर से हाथ बंटाए। जब बच्चे अपने पिता को मां का हाथ बंटाते देखेंगे, तो वो भी समझेंगे कि ये कितना जरूरी है और ऐसे ही धीरे-धीरे उस बदलाव की शुरुआत होगी जिसकी राह शायद महिलाएं कब से ताक रह रही हैं।
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