
गाजियाबाद में दिल दहला देने वाली दुर्घटना सामने आई है, जिसमें तीन सगी बहनों ने ऑनलाइन गेमिंग खेल के कारण अपनी जान ले ली। जब से इस घटना का लोगों को पता चला है, तब से सभी माता-पिता एकदम सहमे हुए हैं। यह घटना एक हादसा नहीं है बल्कि हमारे समाज में फैलते डिजिटल जहर की चेतावनी भी है। ऑनलाइन लव गेम्स, मनोरंजन के रूप में शुरू होते हैं लेकिन कब ये खुद का गुलाम बना लेते हैं और मौत तक ले जाते हैं, पता ही नहीं चलता। एक्सपर्ट का मानना है कि ऑनलाइन लव गेम इन्हें काल्पनिक दुनिया में ले जाते हैं, जहां से वास्तविकता में लौटना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में यदि माता पिता पहले से ही इनके लक्षणों के पहचान लें तो बच्चों को बचाया जा सकता है। ऐसे में इनके लक्षण और बचाव के बारे में पता होना जरूरी है। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि ऑनलाइन लव गेम्स किसे कहते हैं और माता-पिता बच्चों के अंदर एडिक्शन के लक्षण कैसे पहचानें, साथ ही इसके बचाव क्या हैं, ये भी जानेंगे। इसके लिए हमने कोच और हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट, साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है पढ़ते हैं आगे...
ऑनलाइन लव गेम्स (Online Love Games) को डेटिंग सिम्युलेटर या रोमांस गेम्स भी कहते हैं। इन्हें डिजिटल गेम्स कहा जाता है, जहां खिलाड़ी किसी काल्पनिक कैरेक्टर के साथ प्यार में पड़ते हैं और एक अच्छा अनुभव लेते हैं।
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हालांकि, आजकल ये गेम्स केवल मनोरंजन नहीं करते बल्कि सोशल इंटेरक्शन और एआई के जुड़ने से खतरनाक भी हो गए हैं। इनमें खिलाड़ियों को अलग-अलग कैरेक्टर्स के साथ बातचीत करनी होती है, उन्हें डेट पर ले जाते हैं और उनकी पसंद-नापसंद के हिसाब से जवाब चुनकर उनका दिल जीतते हैं।
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एक्सपर्ट के मुताबिक, कोई बच्चा या युवा मोबाइल में ज्यादा समय बिता रहा है और गेम न खेलने मिलने पर गुस्सा करता है या चिल्लाता है तो सतर्क हो जाएं। इससे अलग परिवार के कार्यक्रमों या दोस्तों से दूरी बनाना और अकेले कमरे में बंद रहना भी इसी के लक्षणों में आते हैं। जब बच्चा देर रात तक जागे और उसे खाने-पीने का होश न हो तुरंत उस पर गौर करें। जब बच्चों को गेम्स की लत लगती है तो वे मोबाइल की स्क्रीन दूसरों से छिपाते हैं या बार-बार पासवर्ड बदलते हैं।
माता-पिता हफ्ते में एक दिन नो गैजेट डे मनाएं। रात को सोने से तकरीबन 1 घंटा पहले मोबाइल दूर रखने का नियम बनाएं। साथ ही बच्चों के साथ डांटने के बजाय दोस्तों की तरह बात करें।
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उन्हें समझाएं कि वर्चुअल दुनिया और हकीकत में बहुत फर्क है। बच्चों के मोबाइल में पेरेंटल लॉक लगाएं ताकि आप देख सकें कि वे किस तरह के ऐप या गेम इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे अलग आप बच्चों को आउटडोर गेम्स में लेकर जाएं स्पोर्ट्स या किसी हॉबी क्लास में शामिल करें ताकि उनका दिमाग मोबाइल से हटकर अच्छे कार्में में लगे।
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