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Daadh Devi Mandir: कोटा का हजार साल पुराना चमत्कारी दाढ़ देवी मंदिर, कुंड के पानी से खेत रहते हैं हरे-भरे; जानिए इसका रहस्य और इतिहास

भारत के कई ऐसे मंदिर हैं जिनकी अलग मान्यता और इतिहास है। इन मंदिरों के दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त इकट्ठे होते हैं। ऐसे ही मंदिरों में से एक है कोटा का दाढ़ देवी मंदिर। इस मंदिर की कई अनोखी मान्यताएं हैं जिनकी वजह से नवरात्रि में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। आइए इस मंदिर के रहस्य के बारे में। 
Editorial
Updated:- 2026-03-12, 19:54 IST

हमारे देश में कई ऐसे मंदिर हैं जिनका इतिहास अत्यंत निराला है। कुछ ऐसे मंदिर हैं जिनके बारे में आज भी भक्त ये मानते हैं कि इस मंदिरों में कुछ ऐसी बातें हैं जो इन्हें खास बनाती हैं। ऐसे ही एक मंदिर है कोटा का दाढ़ देवी मंदिर। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर की खासियत की वजह से ही आज भी नवरात्रि में यहां लाखों भक्त इकट्ठे होते हैं और भक्तों का मेला लगता है। राजस्थान के कोटा से लगभग 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित डाढ़ देवी मंदिर प्राचीन समय से ही प्रचिलित है और इसका इतिहास हजार साल से भी पुराना है। अगर हम इस मंदिर को माता दुर्गा का तीर्थ स्थल कहें तो गलत नहीं होगा। कोटा शहर की भागदौड़ और शोरगुल से दूर यह मंदिर चंबल नदी के किनारे स्थित है। इसके चारों ओर उम्मेदगंज के घने जंगल मौजूद है और इसकी आस्था और महिमा सदियों पुरानी मानी जाती है। आइए जानें इस मंदिर के इतिहास और इसके कई रोचक रहस्यों के बारे में।

दाढ़ देवी मंदिर का इतिहास

दाढ़ देवी मंदिर बहुत प्राचीन है, जिसका निर्माण 8वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य किया गया था। इस मंदिर को दाढ़ देवी कहने के पीछे एक विशेष कारण यह है कि यहां मौजूद माता दुर्गा की प्रतिमा में उनकी दाढ़ नजर आती है। पौराणिक कथाओं की मानें तो कोटा के पूर्व राजा उम्मेद सिंह एक बार दाढ़ के असहनीय दर्द से पीड़ित थे और मां की शरण में आए। माता का पूजन करने के बाद ही उनकी दाढ़ का दर्द पूरी तरह से ठीक हो गया। उसी समय से माता को वहां की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर 10 वीं शताब्दी में कैथून के तंवर क्षत्रियों द्वारा बनवाया गया था। डाढ़ देवी वास्तव में रक्त दंतिका देवी है, क्योंकि देवी की डाढ़ बाहर निकली हुई दिखाई देती है। इस कारण लोगों ने माता का नाम डाढ़ देवी रखा और यह मंदिर भी इसी नाम से विख्यात हो गया।

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पूजा के समय क्यों होती थी तोपों की सलामी

दाढ़ देवी मंदिर से जुड़ी एक और रोचक परंपरा भी काफी प्रसिद्ध है। ऐसा बताया जाता है कि पहले के समय में जब कोटा रियासत का शासन था, तब मंदिर में विशेष पूजा के दौरान तोपों की सलामी दी जाती थी। यह परंपरा इसलिए शुरू की गई थी क्योंकि दाढ़ देवी को कोटा के राजपरिवार की कुलदेवी माना जाता था। जब भी मंदिर में विशेष पूजा या नवरात्रि का पर्व आता था, तब राजपरिवार की ओर से देवी को सम्मान देने के लिए तोपों की सलामी दी जाती थी। इस परंपरा से यह स्पष्ट होता है कि मंदिर का संबंध केवल धार्मिक आस्था से ही नहीं, बल्कि कोटा के इतिहास और राजपरंपरा से भी जुड़ा हुआ है।

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कुंड के पानी से खेतों में छिड़काव करने से पौधे रहते हैं निरोगी

दाढ़ देवी मंदिर परिसर के अंदर एक ऐसा पवित्र कुंड भी मौजूद है जिसके पानी से न सिर्फ स्नान करने से बल्कि खेतों में भी इस पानी से सिंचाई करने से सभी रोग-दोष दूर होते हैं। दाढ़ देवी मंदिर परिसर में एक पवित्र कुंड भी स्थित है, जिसे अमृत कुंड कहा जाता है। इस कुंड से जुड़ी मान्यता बेहद रोचक है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस कुंड का जल अत्यंत पवित्र और लाभकारी है और ये जिसके ऊपर भी छिड़का जाता है वो निरोगी हो जाता है।

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नवरात्रि में लगता है भक्तों का मेला

इस मंदिर की महिमा इतनी निराली है कि आज भी नवरात्रि के दौरान दाढ़ देवी मंदिर में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। इन दिनों दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन, पूजा और धार्मिक अनुष्ठान तो होते ही हैं एयर होते हैं। कई भक्त मनोकामना पूरी होने पर माता को प्रसाद चढ़ाने भी आते हैं।

इस प्रकार दाढ़ देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और परंपराओं का अद्भुत संगम भी है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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