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Hasanamba Temple Mystery: 12 महीने बंद फिर भी भीतर जलता रहता है दीपक, हसनंबा मंदिर से जुड़े ऐसे रहस्य जो आपको भी कर सकते हैं हैरान

हमारे देश भारत में मंदिरों की कोई कमी नहीं है, लेकिन कुछ मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं और रहस्यों के कारण विशेष पहचान रखते हैं। ऐसा ही एक मंदिर है कर्नाटक में मौजूद हसनंबा मंदिर जिसके कई रहस्यों के बारे में नहीं जानती होंगी आप।
Editorial
Updated:- 2026-02-04, 21:01 IST

भारत को मंदिरों का देश कहा जाता है और यहां देवस्थानों की कोई कमी नहीं है। हर राज्य और शहर में ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान और अनूठी परंपराएं हैं। किसी मंदिर में ईश्वर की मौजूदगी की बात की जाती है तो कहीं आज भी ज्वाला प्रज्वलित है। यूं कहा जाए कि मंदिरों के कुछ ऐसे रहस्य हैं जो उन्हें दूसरों से अलग बनाते हैं। इनमें से ही एक मंदिर है कर्नाटक के हसन जिले में स्थित हसनंबा देवी मंदिर। यह मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं और रहस्यमय परंपराओं के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है। जहां एक तरफ इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि यह पूरे साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है, वहीं एक और मान्यता यह भी है कि यहां बिना तेल ख़त्म हुए दीपक पूरे साल जलता रहता है। आइए आपको बताते हैं इस मंदिर से जुड़े कई रहस्यों के बारे में।

मंदिर का इतिहास क्या है?

हसनंबा मंदिर लगभग 800 साल पुराना है। इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में होयसल वास्तुकला शैली में हुआ था। मंदिर की मुख्य देवी आदि शक्ति हैं। इसकी बनावट भी बहुत खास है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर को दीमक के टीले के आकार में बनाया गया है, जो इसे एक अलग पहचान देता है। यह मंदिर कर्नाटक के हसन जिले में मौजूद है और इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह साल में केवल एक बार ही खुलता है। हर साल दिवाली के दिन मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोले जाते हैं और इस दिन दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। इस दौरान पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल हो जाता है।

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मंदिर के अंदर की अनोखी झलक

मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही सिद्धेश्वर स्वामी के दर्शन होते हैं। यहां भगवान शिव को शिवलिंग के सामान्य रूप में नहीं, बल्कि अर्जुन को पशुपतास्त्र देते हुए दिखाया गया है। इसके अलावा, रावण की दस मुखों वाली वीणा बजाती हुई एक मूर्ति भी इस मंदिर में मौजूद है जो भक्तों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र है।

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मंदिर के भीतर दीपक कभी नहीं बुझता है

ऐसी मान्यता है कि दिवाली के दिन, मंदिर के अंदर चावल की दो बोरियां, पानी और घी का एक दीपक रखा जाता है। इस दीपक को नंदा दीपम कहते हैं। मंदिर को इस दौरान फूलों से सजाया जाता है और फिर मंदिर को बंद कर दिया जाता है। एक साल बाद जब मंदिर दोबारा खुलता है, तो चावल पका हुआ और गरम होता है। कहा जाता है कि यह चावल कभी खराब नहीं होता है। यही नहीं नंदा दीपम में रखा हुआ घी का दीपक भी पूरे साल जलता रहता है। यह रहस्य इस मंदिर को विशेष बनाता है और आज भी इसका पता नहीं लगाया जा सका है।

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हसनंबा मंदिर की कहानी

हसनंबा का अर्थ है वह मां जो मुस्कुराती है और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती है। एक लोक कथा के अनुसार, देवी ने अपनी दुखी बहू को बचाने के लिए उसे पत्थर में बदल दिया था। इस पत्थर को 'शोशी कल' कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह पत्थर हर साल थोड़ा-थोड़ा देवी की ओर बढ़ता है और कलयुग के अंत में देवी तक पहुंच जाएगा।

हसनंबा मंदिर से जुड़े कई ऐसे रहस्य हैं जिनका पता लगा पाना मुश्किल है और इस मंदिर की खासियत इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है। 
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