
कार्तिगई दीपम तमिलनाडु का एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र दीपों का त्योहार है जो दीपावली से भी पुराना माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह भगवान शिव और उनके पुत्र भगवान मुरुगन यानी कि कार्तिकेय जी को समर्पित है। ज्योतिषीय रूप से यह तब मनाया जाता है जब चंद्रमा 'कार्तिगई' यानी कि कृत्तिका नक्षत्र में और 'पोरनामी' यानी कि पूर्णिमा तिथि पर होता है। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा देव और भगवान विष्णु के सामने भगवान शिव पहली बार 'ज्योति स्तंभ' के रूप में प्रकट हुए थे। साथ ही, इसी दिन भगवान मुरुगन का उद्भव छह दिव्य अग्निशिखाओं से हुआ था जिन्हें 'कृत्तिका' नक्षत्र की देवियों ने पाला था। यह त्यौहार तमिलनाडु के मदुरै स्थित तिरुपरनकुंद्रम मंदिर की मुख्य शोभा है। वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स ने हमें कार्तिगई दीपम पर्व से जुड़ी कई रोचक बातें बताईं जो न सिर्फ आस्था का केंद्र समेटे हुए हैं बल्कि हमारे ज्योतिष का आधार लिए हुए भी है।
तमिलनाडु के मदुरै में स्थित तिरुपरनकुंद्रम मंदिर भगवान मुरुगन के 'आरुपदैवीडु यानी कि छह पवित्र निवासों से पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यहां मनाया जाने वाला कार्तिगई दीपम केवल एक त्योहार नहीं बल्कि आस्था और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संगम है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिरुपरनकुंद्रम वह स्थान है जहां भगवान मुरुगन ने असुरों पर विजय प्राप्त करने के बाद देवराज इंद्र की पुत्री देवयानी से विवाह किया था। कार्तिगई दीपम के दिन यहां भगवान शिव और मुरुगन दोनों की विशेष आराधना की जाती है।
यह माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव एक विशाल 'अग्नि स्तंभ' के रूप में प्रकट हुए थे जिसका आदि और अंत खोजने में ब्रह्मा और विष्णु भी असमर्थ रहे थे। यह अग्नि अहंकार के विनाश और ज्ञान के उदय का प्रतीक है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान मुरुगन का जन्म शिव के तीसरे नेत्र से निकली छह अग्नि चिनगारियों से हुआ था। इन छह स्वरूपों को 'कृत्तिका' नक्षत्र की छह देवियों ने पाला था। इसलिए, इस दिन मुरुगन की पूजा करना उन्हें पालने वाली माताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करना भी है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कार्तिगई दीपम का समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संचार के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। यह त्योहार तब मनाया जाता है जब चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में होता है और तिथि पूर्णिमा होती है। कृत्तिका नक्षत्र का स्वामी 'अग्नि' देव को माना जाता है।
ज्योतिष में अग्नि को शुद्धिकरण का कारक माना गया है जो जीवन के दोषों को जलाकर भस्म कर देती है। इस समय सूर्य वृश्चिक राशि में होता है और चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ के निकट होता है। यह संतुलन मन और आत्मा की शुद्धि के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।

तिरुपरनकुंद्रम मंदिर में इस उत्सव की परंपरा सदियों पुरानी है। यहां पहाड़ी की चोटी पर एक विशाल तांबे के बर्तन में भारी मात्रा में घी और कपूर डालकर 'महादीपम' प्रज्वलित किया जाता है।
जैसे ही शाम को पहाड़ी पर यह विशाल ज्योति जलती है पूरा मदुरै शहर 'अरोहरा' के जयघोष से गूंज उठता है। परंपरा यह है कि इस ज्योति को देखकर लोग अपने घरों के बाहर मिट्टी के दीपक जलाते हैं।
चूंकि यह मंदिर एक पहाड़ी पर है, इसलिए यहां दीप जलाना आकाश और पृथ्वी के मिलन का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा सिखाती है कि जिस प्रकार ज्योति हमेशा ऊपर की ओर उठती है, मनुष्य का लक्ष्य भी उच्च आध्यात्मिक चेतना की ओर होना चाहिए।
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