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Main Hoon Apni Dhanlaxmi Part-18: बच्चों की पढ़ाई के लिए सेविंग नहीं, सही प्लानिंग है जरूरी

बच्चों की पढ़ाई हर माता-पिता का सबसे बड़ा सपना होती है, लेकिन इस सपने को पूरा करने के लिए सिर्फ सेविंग नहीं, सही फाइनेंशियल प्लानिंग भी जरूरी होती है। आज शिक्षा का खर्च जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए पहले से तैयारी करना बहुत जरूरी है।
Editorial
Updated:- 2026-03-24, 12:42 IST

प्रत्येक अभिभावक के जीवन में ऐसा क्षण आता है। टेबल पर कॉलेज के ब्रोशर रखे होते हैं। करियर के विकल्पों पर बातचीत में संजीदगी दिखने लगती है। अच्छे संस्थान में प्रवेश को लेकर गर्व और उत्साह के उन क्षणों में आपकी नजर कुछ अंकों‍ पर जाती है। आकांक्षाओं का सामना अंकगणित से होता है। हमारे भारतीय घरों में बच्चों की पढ़ाई हमेशा से भावनात्मक विषय रहा है। अभिभावकों के मन में चाह यही होती है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा और माहौल मिले। परिवार की उम्मीदें उनसे जुड़ी होती हैं। संतान को लेकर इतनी भावुकता के बावजूद उनकी शिक्षा के लिए वित्तीय तैयारी पीछे छूट जाती है। इच्छाशक्ति मजबूत होती है, लेकिन उसके लिए खाका तैयार करने में हम पीछे रह जाते हैं। परिवारों से एक सामान्य चूक हो जाती है।

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भविष्य में शिक्षा का खर्च क्या होगा, इसका सही आकलन वे नहीं कर पाते। आज का खर्च हम जानते-समझते हैं, लेकिन भविष्य का क्या? हम मौजूदा फीस के ढांचे के अनुसार सोचते हैं कि अगर उसके आसपास खर्च मानकर चलें तो तैयारी पूरी होगी। हम ये भूल जाते हैं कि शिक्षा पर होने वाला खर्च कितनी तेजी से बढ़ रहा है। ट्यूशन फीस के अलावा भी बहुत खर्चे होते हैं। हमने पूर्व में चर्चा की है कि भारत में सामान्यत: मुद्रास्फीति करीब पाँच-छह प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। शिक्षा के खर्च में मुद्रास्फीति सामान्य से अधिक असर डालती है। बहुत से निजी स्कूलों, प्रोफेशनल कालेजों और विशिष्ट पाठ्यक्रमों के सालाना खर्च में आठ-दस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी सामान्य बात है। एक अर्से में दोनों के मध्य एक बड़ी खाई आ जाती है, जिसे पाट पाना मुश्किल होता है। शिक्षा का खर्च सिर्फ फीस से जुड़ा मामला नहीं होता। उसमें छात्रावास, कोचिंग, किताबों, लैपटॉप, सर्टिफिकेशन प्रोग्राम, यात्रा और कभी-कभार अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र इत्यादि का खर्च भी शामिल होता है। यदि आज किसी प्रोफेशनल पाठ्यक्रम का खर्च 20 लाख है और उसमें सालाना नौ प्रतिशत की दर से बढ़ोत्तरी हो रही है तो 10 साल बाद उसी पाठ्यक्रम का खर्च करीब 50 लाख रुपये हो जाएगा। 15 साल में वह खर्च 60 लाख रुपये को पार कर जाएगा।

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यहां भी खर्च में चक्रवृद्धि का नियम काम करता है। एक बार जब भावी खर्च के आंकड़े स्पष्ट हो गए, उसके बाद वास्तविक सवाल उठता है। ऐसे लक्ष्य के लिए किस प्रकार स्वयं को आर्थिक रूप से तैयार करें। इसका उत्तर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आपके पास कितना समय है। जब बच्चा छोटा होता है और आपके पास दस साल या अधिक का समय है तो बढ़त आधारित निवेशों जैसे विविधतापूर्ण इक्विटी म्यूचुअल फंड्स का चयन महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। ये देखा गया है कि शिक्षा का खर्च जिस गति से बढ़ता है, उससे अधिक प्रतिफल आपको दीर्घकाल में बेहतर संभावनाओं वाले इक्विटी फंड्स में निवेश से मिलता है। ऐसा नहीं है कि बाजार में उतार-चढ़ाव नहीं आएंगे, किंतु जब निवेश लंबे समय के लिए होता है तो धन की बढ़त के अवसर बनते हैं।

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पोर्टफोलियो की समीक्षा करते समय मैं अक्सर देखती हूं कि लोग शिक्षा के लिए धन को फिक्स्ड डिपॉजिट या परंपरागत चाइल्ड प्लान्स में लगाते हैं, जिनमें छह-सात प्रतिशत रिटर्न मिलता है। ये विकल्प सुरक्षित लगते हैं और जब कोई लक्ष्य बच्चों से जुड़ा हो तो हम सुरक्षा का महत्व देते हैं, किंतु यदि शिक्षा का खर्च सालाना नौ-दस प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और निवेश पर मिलने वाला रिटर्न छह-सात प्रतिशत है तो ये अंतर साल दर साल बढ़ता जाएगा। ये आपको आज भले ही न महसूस हो पर लंबे समय में स्पष्ट दिखाई देगा।

ये संवाद बदल जाता है जब उच्च शिक्षा का लक्ष्य तीन साल बाद हो। बाजार का कैलेंडर शैक्षणिक प्रवेश के अनुसार नहीं चलता। फीस जमा करने की तिथि से ठीक पूर्व क्षणिक गिरावट भी बड़ा तनाव दे सकती है। इस पड़ाव पर उच्च रिटर्न के बजाय स्थिरता महत्वपूर्ण हो जाती है। जब लक्ष्य निकट हो तो फिक्स्ड डिपाजिट या अल्पकालिक ऋण फंड्स बेहतर विकल्प साबित होते हैं। वास्तविक अनुशासन न केवल सही निवेश विकल्पों के चयन, बल्कि ये जानने में है कि उसे कहां समायोजित करना है। जब लक्ष्य दूर हो तो धन की बढ़त पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। जब शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश का वर्ष निकट आता है तो धन को सुरक्षित विकल्पों में डाल सकती हैं।

बहुत से परिवार सोच-विचार निवेश करते हैं, लेकिन बाद में उसे दूसरे विकल्पों में स्थानांतरित करना भूल जाते हैं। जिस धन को आपने निवेश से बनाया है उसे सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
योजनाबद्ध तरीके से इसकी शुरुआत जब 10-12 साल पहले हो जाती है, तब मासिक निवेश करना सहज लगता है। जब इस निर्णय में देरी हो जाती है तो उसी लक्ष्य के लिए बड़े अंशदान की आवश्यकता होती है, क्योंकि समयकाल घट जाता है। शिक्षा ऋण पर भी ईमानदारी से बात होनी चाहिए। उसमें सामान्य तौर पर गलत कुछ भी नहीं है, पर उसे सोच-विचारकर लेना चाहिए। समस्या तब आती है जब ऋण लेना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है, क्योंकि आपने समय रहते तैयारी नहीं की। इस संबंध में पहले से ही योजना बनाकर चलने का लाभ होता है, तब आपको मजबूरी में तत्काल निर्णय नहीं लेने पड़ते। आपके पास इतनी मजबूती होती है कि इच्छानुसार निर्णय ले सकें। प्रत्येक घर की आर्थिक स्थिति भिन्न होती है। स्थिर आय, बच्चों की संख्या, मौजूदा देनदारियां, दीर्घकालिक लक्ष्यों और सही दृष्टिकोण पर काफी कुछ निर्भर करता है। इस स्तंभ में हम आपको व्यक्तिगत सलाह नहीं देते हैं और न ही किसी खास उत्पाद के क्रय की अनुशंसा करते हैं। हमारा उद्देश्य आपकी सोच को स्पष्ट करना है ताकि आत्मविश्वास के साथ आप निर्णय ले सकें। आवश्यकतानुसार कुशल वित्तीय विशेषज्ञ की भांति आपको सलाह उपलब्ध कराना ही ध्येय है।
इस हफ्ते इस बात पर विचार करें कि जब आपका बच्चा चयनित पथ पर कदम रखने को तैयार होगा, तो उच्च शिक्षा का खर्च क्या होगा। फीस, रहने का खर्च, ट्यूशन की फीस व अन्य संबंधित खर्चों को जोड़कर देखें। इसके बाद विचार करें कि क्या आपके वर्तमान निवेश समय के साथ तालमेल बिठा सकेंगे। संतान की शिक्षा के लिए तैयारी पहले से होनी चाहिए। जब एडमिशन लेटर प्राप्त होता है, तब सोचने का औचित्य नहीं है। सधे निवेश के साथ पहले से तैयारी करें ताकि जब समय आए तो आपकी आर्थिक नींव इतनी मजबूत हो कि उसके सपनों को साकार करने में सहयोग कर सके।
यदि आपके मन में इस विषय में कोई सवाल हैं या कोई चर्चा करना चाहती हैं तो हमारी ईमेल आईडी पर लिखें[email protected]

 

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