
बहुत से निवेशक इस बात पर विशेष ध्यान देते हैं कि किस दिशा में निवेश करना है। कौन सा म्यूचुअल फंड अच्छा प्रदर्शन कर रहा है? किस शेयर का मूल्य बढ़ रहा है? क्या सोने की कीमतें बढ़ेंगी? पर जब आप दीर्घकालिक निवेश पोर्टफोलियो को ध्यान से देखें तो एक बात स्पष्ट हो जाएगी। संपत्ति बनाने में ये बात इतनी महत्व नहीं रखती कि आप कौन सी परिसंपत्ति का चयन कर रहे हैं। यहां मायने रखता है कि किस तरह आप अपने धन को विभिन्न निवेश विकल्पों में बांटते हैं। परिसंपत्तियों के विभिन्न विकल्पों में निवेश के लिए धन का आवंटन किस प्रकार करना है, ये महत्वपूर्ण है।

आपका संपूर्ण धन किस अनुपात में निवेश के विभिन्न विकल्पों उदाहरणस्वरूप इक्विटी निवेश- शेयर व म्यूचुअल फंड्स, सुरक्षित विकल्प जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट व ऋण फंड्स, सोने इत्यादि में लगाना उचित होगा, ये समझना आवश्यक है। वास्तव में इसी पर आपकी वित्तीय यात्रा तय करती है। एक सरल उदाहरण से इसे समझें। दो लोग है, प्रत्येक ने 10 लाख रुपये निवेश किए हैं। एक व्यक्ति ने अपना 80 प्रतिशत धन इक्विटी निवेश जैसे इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में जबकि 20 प्रतिशत धनराशि सुरक्षित विकल्पों जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट या ऋण फंड्स में लगाई है। दूसरे ने अपनी 50 प्रतिशत धनराशि फिक्स्ड डिपॉजिट या वैसे ही सुरक्षित निवेशों में लगाई है। भले ही दोनों ने जहां भी धनराशि लगाई है, वे विकल्प अच्छा प्रदर्शन करते हैं, इसके बावजूद उनकी वित्तीय यात्रा काफी अलग होगी। पहले व्यक्ति को तेजी से बाजार के उतार-चढ़ाव का सामना करना होगा, जबकि दूसरे व्यक्ति की धनराशि में बढ़त धीमी गति से होगी, लेकिन उसकी चाल सधी रहेगी। बाजार के उतार-चढ़ाव के फलस्वरूप कई बार लोग भावावेश में खरीद-फरोख्त का निर्णय लेते हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से उनके निवेश के तरीके से उनके निर्णयों पर असर पड़ेगा व दीर्घकालिक परिणाम भी प्रभावित होंगे।
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इस पड़ाव पर एक और बात समझनी चाहिए। जोखिम उठाने के लिए मानसिक रूप से तैयार होने और उसे झेल पाने की क्षमता में अंतर होता है। जोखिम लेने का निर्णय कई बार भावनाओं से जुड़ा मामला होता है। ये इस बात को दर्शाता है कि आप बाजार के उतार-चढ़ाव को लेकर कितना सहज महसूस करते हैं। जोखिम लेने की क्षमता व्यावहारिक पहलू है। यहां आशय होता है कि अपने रोजमर्रा के जीवन व लक्ष्यों को अप्रभावित रखते हुए आप बाजार के झटकों को कितना सहन कर सकते हैं। अगर आप ऐसा कोई लक्ष्य लेकर चल रहे हैं जिसके लिए 15 वर्ष का समय है और आय में भी स्थिरता है, तो आप इक्विटी में निवेश कर सकते हैं। अगर आपको अगले तीन साल में धन चाहिए तो उसका बड़ा हिस्सा सुरक्षित विकल्पों जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट या अल्प अवधि के ऋण फंड्स में निवेश करना उचित होगा। यहां इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप बाजार को लेकर कितना सहज महसूस करते हैं।

यहां कई लोग एक बात की अनदेखी कर जाते हैं। परिसंपत्ति के विकल्पों में धन का आवंटन सिर्फ संभावित लाभ से जुड़ा मामला नहीं है। ये आपके भविष्य को सुरक्षित रखने से जुड़े निर्णयों के बारे में भी है। कल्पना करें कि बाजार में एक झटके में 25 प्रतिशत की गिरावट आती है। यदि आपका सारा धन इक्विटी निवेश में लगा है तो संभव है कि और अधिक गिरावट के भय से आप उन्हें बेचने का दबाव महसूस करेंगी, किंतु यदि आपके पोर्टफोलियो में पर्याप्त राशि फिक्स्ड डिपॉजिट या ऋण फंड्स में निवेशित है तो आपके भीतर धैर्य होगा। जल्दबाजी में कोई निर्णय लेने से बचेंगी और स्थिति सामान्य होने की प्रतीक्षा कर सकेंगी। सरल शब्दों में कहें तो विभिन्न विकल्पों में निवेश के लिए धनराशि का अनुपात सुनिश्चित करने से आप मानसिक दबाव से मुक्त रहेंगी। लंबे समय तक धनराशि निवेशित रखने पर आपको चक्रवृद्धि ब्याज का लाभ भी मिल सकेगा। किसी सधी रणनीति के अभाव में अच्छे निवेश विकल्प के चयन से भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, क्योंकि भावनाएं उसके आड़े आ जाती हैं।
समय के साथ परिसंपत्तियों में धन के निवेश अनुपात में भी परिवर्तन आना चाहिए। 30 वर्ष की आयु में जो निर्णय ठीक प्रतीत होते हैं, हो सकता है कि 50 की आयु में वे उपयुक्त न हों। जैसे-जैसे जिम्मेदारियां बढ़ती हैं व लक्ष्य निकट आते हैं तो इक्विटी और फिक्स्ड आय विकल्पों के मध्य पुन: संतुलन बिठाने की आवश्यकता पड़ सकती है। परिसंपत्तियों के लिए धन का आवंटन कोई एक बार लिया जाने वाला निर्णय नहीं है।
उम्र बढ़ने के साथ ही इसके ढांचे में भी बदलाव आता है। प्रोफेशनल पोर्टफोलियो प्रबंधन में पहला निर्णय सदैव धन के आवंटन से जुड़ा होता है। कितना धन कहां निवेश किया जाना है, इक्विटी, फिक्स्ड डिपॉजिट गोल्ड में निवेश का अनुपात क्या होगा, ये तय करने के बाद हम उसके बेहतर विकल्पों का चयन करते हैं। निजी निवेशक इसके उलट व्यवहार करते हैं। वे कुल निवेश राशि को देखते हैं। कालांतर में उनके निवेश पोर्टफोलियो में बिखराव दिखता है और वे अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं।
इस हफ्ते एक व्यावहारिक कदम उठाएं। अपने सभी निवेश की सूची बनाएं। उन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित करें- इक्विटी निवेश जैसे शेयर्स या इक्विटी म्यूचुअल फंड्स, स्थिरता वाले निवेश जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट, रिकरिंग डिपॉजिट और ऋण फंड्स, सुरक्षा प्रदान करने वाले निवेश जैसे गोल्ड। इसके बाद गणना करें कि संपूर्ण निवेश राशि में से कितना हिस्सा कहां लगाया है। संभव है कि ये देखकर आप सोच में पड़ जाएंगी कि निवेश का यह तरीका आपके दीर्घकालिक लक्ष्यों से पूरी तरह मेल नहीं खाता। परिसंपत्तियों में निवेश राशि का अनुपात तय करने को लेकर कोई उत्साह भले ही न महसूस हो, पर इसे गंभीरता से लेना चाहिए। इससे आपके निवेश को दिशा मिलती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। संपत्ति निर्माण से जुड़ा कोई भी निर्णय लेने से पहले सूझबूझ से उसका खाका तैयार करना चाहिए।
अगले हफ्ते हम बात करेंगे कि संतान की अच्छी शिक्षा के लिए समय रहते कौन से निवेश विकल्पों का चयन बेहतर साबित हो सकता है। जब भविष्य और आकांक्षाओं को आकार देने के लिए सधी हुई रणनीति हो तभी वित्तीय स्वावलंबन का लक्ष्य सफल होता है।
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