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अफगानिस्तान से एक ऐसी खबर आई है जो किसी रोंगटे खड़े कर देने वाली फिल्म की कहानी जैसी लगती है, लेकिन बदकिस्मती से यह वहां की महिलाओं की नई हकीकत है। बता दें कि तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने 90 पन्नों के एक नए क्रिमिनल कोड पर साइन कर दिए हैं, जिसने अफगान समाज की महिलाओं को पुरुषों के सामने कमतर कर दिया है। हम बात कर रहे हैं नए कानून की, जिसे 'दे महकूमू जजाई उसूलनामा' कहा जा रहा है। इसने महिलाओं की स्थिति को समाज में महज एक गुलाम के बराबर लाकर खड़ा कर दिया है। ऐसे में ये जानना तो बनता है कि क्या है यह नया कानून और यह कैसे समाज को चार वर्गों में बांट रहा है। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि महिलाओं पर बना यह नया कानून क्या है। पढ़ते हैं आगे...
मानवाधिकार समूह रावदारी (Afghan-based human rights group) की रिपोर्ट के अनुसार, 4 जनवरी 2026 को जारी इस नई संहिता के आर्टिकल 9 के तहत अफगान समाज को चार श्रेणियों में बांट दिया गया है-
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चौंकाने वाली बात यह है कि अब सजा अपराध देखकर नहीं, बल्कि अपराधी की सामाजिक हैसियत देखकर तय होगी। अगर उलेमा से कोई अपराध होता है, तो उन्हें केवल सलाह देकर छोड़ दिया जाएगा। अशरफ को केवल कोर्ट में पेश होने की हिदायत दी जाएगी। वहीं, यही अपराध अगर कोई मध्यम वर्ग का व्यक्ति करे तो उसे जेल और निचले वर्ग के व्यक्ति को जेल के साथ-साथ कोड़े मारने जैसी सजा दी जाएगी।
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इस क्रिमिनल कोड में गुलाम शब्द का बार-बार इस्तेमाल किया गया है, जो न केवल गुलामी को महत्व देता है बल्कि महिलाओं को भी इसी श्रेणी में रखता है। कानून के आर्टिकल 4 के अनुसार, पति को अपनी पत्नी को और मालिक को अपने गुलाम को दंडित करने का कानूनी अधिकार दे दिया गया है।

अब अगर कोई पति अपनी पत्नी को पीटता है, तो उसे तब तक सजा नहीं मिलेगी जब तक वह डंडे से न पीटे या पत्नी को गंभीर रूप से घायल न कर दे। यदि पत्नी अपनी चोटें साबित भी कर देती है, तो भी पति को अधिकतम केवल 15 दिन की जेल होगी। इससे अलग, यदि कोई महिला अपने पति की अनुमति के बिना अपने पिता या किसी रिश्तेदार के घर जाती है और वापस नहीं लौटती, तो उसे 3 महीने तक की कैद हो सकती है। इतना ही नहीं, उसे शरण देने वाले रिश्तेदारों को भी अपराधी माना जाएगा, जिससे प्रताड़ित महिलाओं के लिए भागने के सारे रास्ते बंद हो गए हैं।
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