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 aaj ka suvichar 27 jan 2026

Aaj Ka Suvichar 27 Jan 2026: नफरत भी है प्रेम का ही रूप, आज के सुविचार में गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर ने खोला रिश्तों का रहस्य

गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर 27 जनवरी 2026 के 'आज का सुविचार' में रिश्तों के गहरे रहस्य बताते हैं। वे समझाते हैं कि प्रेम और घृणा दोनों ही संबंधों की अभिव्यक्ति हैं, क्योंकि हम अजनबियों से नफरत नहीं करते। नवजात शिशु की तरह निस्वार्थ भाव से जुड़ना ही शुद्ध प्रेम है। ज्ञान से हम अपने सीमित प्रेम को सार्वभौमिक बना सकते हैं, जिससे हर रिश्ता प्रेम की मूल ऊर्जा से जीवंत रहे।
Editorial
Updated:- 2026-01-27, 07:30 IST

रिश्ते सिर्फ नाम या सामाजिक बंधन नहीं होते, बल्कि ये हमारे भीतर बहने वाली भावनाओं का दर्पण होते हैं। अक्सर हम प्रेम और घृणा को एक-दूसरे का दुश्मन मानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस व्यक्ति से हमारा कोई नाता नहीं, हम उससे नफरत भी नहीं कर पाते?

27 जनवरी 2026 के 'आज का सुविचार' में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवि शंकर जी हमें रिश्तों के अनकहे रहस्य से रूबरू करा रहे हैं। वे बताते हैं कि संसार का हर रिश्‍ता चाहे वह अटूट विश्वास हो या कड़वाहट भरी नफरत प्रेम की ही अभिव्यक्ति है। इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि कैसे नवजात शिशु की तरह निस्वार्थ भाव से जुड़ना ही जीवन की सबसे शुद्ध अवस्था है और कैसे ज्ञान के माध्यम से हम अपने सीमित प्रेम को सार्वभौमिक बना सकते हैं।

आज का सुविचार

aaj ka suvichar

'हर संबंध प्रेम की अभिव्यक्ति है।'
-गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

सामान्यतः प्रेम को हम सीमित अर्थों में समझते हैं। जब हम प्रेम की बात करते है, तब दांपत्य, परिवार या मित्रता तक ही इसे सीमित कर देते है। किंतु वास्तव में प्रेम इससे कहीं व्यापक है। प्रेम वह मूल ऊर्जा है, जिससे हर संबंध जन्म लेता है और जिसके कारण संबंध जीवंत रहता है।

शिशु की तरह दिल से जुड़ने के फायदे

जब मनुष्य इस संसार में आता है, तब वह प्रश्नों और तर्कों के साथ नहीं आता। एक नवजात शिशु किसी से यह नहीं पूछता कि आप कौन हैं, क्या करते हैं या कहां से आए हैं। वह सीधे जुड़ता है। यह जुड़ाव हृदय के स्तर पर होता है। हृदय जब 'हां' कहता है, वही विश्वास कहलाता है। यही विश्वास संबंध की पहली नींव है। शिशु का मां पर सहज विश्वास, बिना किसी शंका के प्रेम की शुद्धतम अभिव्यक्ति है।

आरंभिक अवस्था में बच्चा मां, पिता, नर्स, आसपास के लोग, हर किसी से जुड़ाव महसूस करता है। इस समय इसका प्रेम सार्वभौमिक होता है। वह सिर्फ प्रेम है। किंतु जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, यह जुड़ाव सीमित होने लगता है।

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सच्‍चे रिश्‍ते बनाएं

हमारे सारे संबंध और हमारी सभी भावनाएं प्रेम की ही अभिव्यक्ति है। यहां तक कि घृणा भी प्रेम की ही विकृत अभिव्यक्ति है। हम अजनबियों से घृणा नहीं करते; हम उन्हीं से घृणा करते हैं, जिनसे हमारा गहरा संबंध होता है या जो हमें नुकसान पहुंचाते हैं।

संबंध बुद्धि से नहीं, अनुभूति से बनते है यही कारण है कि सच्चे संबंध समझ से नहीं, संवेदना से गहरे होते हैं।

ज्ञान और विवेक हमें पुनः उसी मूल अवस्था की ओर ले जाते हैं, जहां हमारा प्रेम सीमित नहीं रहता। योग और आत्मबोध मनुष्य को उसी असीम प्रेम की अवस्था में पहुंचा देते है, जो एक शिशु की होती है। प्रेम से भरा ऐसा ह्रदय जो सभी से जुड़ सकता है। यही अवस्था सार्वभौमिक प्रेम है।

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हर रिश्‍ता, चाहे वह मित्रता हो, पारिवारिक हो, सामाजिक हो या विरोध का ही क्यों न हो, मूल रूप से प्रेम की ही अभिव्यक्ति है।

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