
पुरानी दिल्ली की उस तंग कॉलोनी में खड़ी तीन मंजिला बिल्डिंग पहली नजर में डरावनी नहीं लगती थी। सड़क में दौड़ती हुई गाड़ियां और भीड़ के शोर गुल में दिन के समय इमारत मानो छिप सी जाती थी। हल्का गुलाबी रंग, जगह-जगह से उखड़ा हुआ प्लास्टर, जंग खाई रेलिंग और बरामदे के बीचों-बीच टिमटिमाता हुआ एक अकेला बल्ब, वैसे तो दिखने में सब कुछ आम था और किसी दूसरी बिल्डिंग की ही तरह दिखाई देता था, लेकिन एक चीज जो उसे दूसरों से अलग बनाती थी, वो था उस बिल्डिंग का कमरा नंबर 13...आखिर क्या खास था इस कमरे में? आखिर कोई इसे किराए पर क्यों नहीं लेना चाहता था?क्या उस कमरे में किसी आत्मा का साया था? क्या कमरे से जुड़ी बातें सिर्फ अफवाह थीं या सच में इस कमरे में कुछ डरावनी घटनाएं होती थीं?

कॉलोनी के लोग जब भी उस कमरे की ओर देखते, तो नजरें घुमा लेते थे कहा जाता था-उस कमरे में कोई लड़की छह महीने से ज्यादा रुक नहीं पाई और अगर रुकी तो उसके बाद कभी दिखाई नहीं दी। कई लोग तो ये भी कहते थे कि उस कमरे में जो भी ज्यादा दिनों ताज रुक जाता है वो जिंदा ही नहीं बचता है। पुरानी दिल्ली की उस कॉलोनी में मौजूद गर्ल्स पीजी का ये कमरा काफी समय से बंद ही था।

मायरा ने भी यह सब सुना था, लेकिन वो इन सब बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं देती थी, उस समय मायरा को इंटर्नशिप के लिए दिल्ली में एक पीजी की तलाश थी और दूसरे पीजी का किराया आसमान छू रहा था। वैसे तो इस पीजी का किराया भी कम नहीं था, लेकिन कमरा नंबर 13 बहुत सस्ता था। यूं कहा जाए कि ये मायरा के बजट में ही था।
जब ब्रोकर ने मायरा को बताया कि कमरा नंबर 13 दूसरे कमरों की तुलना में सस्ता, फर्निश्ड और तुरंत उपलब्ध है, तो मायरा ने ज्यादा सवाल-जवाब किए बिना ही ब्रोकर को एडवांस दे दिया। हालांकि उसने एक सवाल पूछ ही लिया कि “इस कमरे में ऐसा क्या है जो बाकी लड़कियां इसमें ज्यादा दिन टिक नहीं पाईं और छोड़ गईं?”
ब्रोकर मुस्कराया और बोला “मैडम, लड़कियां जल्दी डर जाती हैं… किसी की कही सुनी बातों में आ जाती हैं और इस कमरे का नंबर 13 है तो अफवाहों को सच मान लेती हैं। बस यही सच्चाई है और ऐसा कुछ नहीं हैं इस कमरे में"

मायरा ने हामी भरते हुए कमरे की चाबी ले ली और उसी पल मानो जैसे बिल्डिंग ने भी गहरी सांस ली हो। ऐसा लग रहा था कि वो कमरा भी किसी लड़की का ही इंतजार कर रहा था। कमरे में कदम रखते ही मायरा को अजीब सी गर्मी महसूस हुई। वैसे सर्दियों का मौसम था और कमरे का गरम होना आम नहीं था, लेकिन खिड़की से आने वाली तेज धूप उस कमरे को जरूरत से ज्यादा गर्म कर रही थी।
दीवारों पर हल्की सी सीलन थी और कोने में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी जिसमें बदबू भी आ रही थी। मायरा ने अलमारी का दरवाजा खोल दिया और जल्दबाजी में ऑफिस के लिए निकल गई। पूरे दिन ऑफिस में नए लोगों के साथ मिलना-जुलना हुआ और काम में व्यस्त मायरा मानो सब कुछ भूल गई कि उसने पीजी का जो कमरा लिया है उसके बारे में लोग अजीब सी बातें करते हैं। ऑफिस का काम खत्म करते-करते रात के 8 बज चुके थे और वो अपने पीजी के लिए निकल गई। घर पहुचंते ही उसने देखा कि कमरे में अजीब सा सन्नाटा पसरा था और कमरे की अलमारी बंद थी। नेहा ने खुद ही मन में सोचा कि शायद तेज हवा से बंद हो गई होगी।

थकी हुई मायरा रात के 11 बजे, जैसे ही वह बिस्तर पर लेटी उसे नींद आ गई। अभी मायरा की नींद गहरी हुई ही थी कि तभी दरवाजे के खटखटाने की तेजी से आवाज आने लगी। रात के 1 बजे थे और मायरा ने मन में सोचा 'अरे ! इतनी रात को भला कौन आया होगा, हो सकता है किसी नई नाइट शिफ्ट हो कौर कुछ चाहिए हो'... कौन है, किसने दरवाजा खटखटाया? क्या चाहिए? मायरा ने भीतर से आवाज लगाई। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन दरवाजे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई। बहुत धीमी… जैसे कोई जानबूझकर धीरे चलने की कोशिश कर रहा था।
मायरा ने दरवाजा खोलकर देखा, लेकिन बाहर सन्नाटा था। "शायद मेरा वहम था, पता नहीं कैसी आवाजें आने लगती हैं; उफ मेरी नींद खराब कर दी। सो जाती हूं कल सुबह ऑफिस भी तो जाना है। "
वैसे दिन में सब आम ही लगता था। ऑफिस, लैपटॉप, कॉल्स, कॉफी और आगे बढ़ने की होड़ में मायरा की जिंदगी बस भाग रही थी।
लेकिन जैसे ही रात होती और मायरा घर आकर सोने जाती थी रात को अजीब सी आहट, कभी तेजी से दौड़ने की आवाजें, तो कभी किसी की फुसफुसाहट मानो कमरा नंबर 13 रात को बदल जाता था।
कभी कमरे की अलमारी अपने आप खुल जाती, तो कभी शीशे में मायरा को खुद की ही परछाई दिखाई देने लगती। वैसे मायरा को डर तो लगता था, लेकिन ये उसका वहां ही हो शायद ऐसा सोचते हुए लगभग 5 महीने निकल गए। छठे महीने की शुरुआत हो चुकी थी और उस रात जब मायरा घर आकर सोने लगी तब रात को ठीक 3:13 बजे किसी ने तेजी से दरवाजा खटखटाया और मायरा की नींद टूट गई।
दरवाजे के बाहर किसी के रोने की आवाज आ रही थी। आवाज एक लड़की की थी "“मुझे मत छोड़ो… प्लीज़…” वो रोने की आवाज शायद कमरे के अंदर से ही आ रही थी। मायरा ने कमरे के चारों तरफ देखा और आवाज सुनने की कोशिश की। वो आवाज शायद अलमारी के अंदर से आ रही थी।
कांपते हाथों से मायरा ने अलमारी खोली, अंदर सिर्फ उसके कपड़े और कुछ किताबें ही थीं, फिर ये आवाज? मायरा ने खुद से ही एक बार फिर पूछा आखिर ये आवाज कैसी थी, उफ ये क्या था? ये कैसी अजीब सी आवाज थी जिसने मुझे इतना डरा दिया। पूरी रात मायरा को नींद नहीं आई, लेकिन वो किसी तरह करवटें बदलकर सोती रही।
अगली रात फिर वही आवाज मायरा के कानों में गूंजने लगी- “मुझे यहां ये निकालो, प्लीज मुझे छोड़कर मत जाओ”। अलमारी खोलते ही मायरा के पैरों तले जमीन खिसक गई। अलमारी की अंदरूनी दीवार पर…नाखूनों के गहरे निशान थे जैसे किसी ने बाहर निकलने की बेतहाशा कोशिश की हो।
अगली सुबह मायरा ने पड़ोस में रहने वाली आंटी से पूछा “आंटी, इस कमरे में पहले कौन रहता था?” आंटी का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने चारों ओर देखा और फुसफुसाई “बेटा, उस कमरे का नाम भी मेरे सामने मत लिया करो, मैं क्या कोई भी तुम्हे उसके बारे में नहीं बताएगा। पर क्यों?”

आंटी की आवाज कांप रही थी “उस कमरे में सिर्फ लड़कियां ही रहने आईं, लेकिन कोई भी 6 महीने से ज्यादा नहीं रुक पाई। एक-एक करके… सब गायब हो गईं। मकान मालिक हमेशा बस यही बोलता है कि लड़कियां खुद ही कमरा छोड़कर भाग गईं।”
मायरा की आंखें खुली रह गईं और मन में कई सवाल आने लगे। आखिर सभी लड़कियां गईं कहां? क्या सच में कमरा नंबर 13 हॉन्टेड है? क्या सच में उसमें कोई रहता है? क्या सच में वहां कोई साया दिखाई देता है? अगर हां तो क्या वो आवाज जो मुझे सुनाई दे रही थी वो उसी की थी?
उसी रात मायरा ने अपना कमरा खंगाला और उसे अलमारी के पीछे से एक पुरानी डायरी मिली। डायरी में कांपती लिखावट से कुछ अलग ही लिखा था जिसे देखकर मायरा की चुप्पी डर में बदल गई , डायरी में लिखा था “आज तीन महीने हो गए। मैं यहां फंस गई हूं। कमरे में कोई है। वो कहता है कमरा नंबर 13 कभी खाली नहीं रहता और तुम यहां से जा नहीं सकती"

मायरा पन्ने पलटती गई। “अगर कोई यह पढ़ रहा है, तो समझ लो यह कमरा किराए पर नहीं उठता है बल्कि यहां आने वाला कभी यहां से बाहर नहीं जा पाता है। ये कमरा लड़कियों की कुर्बानी लेता है"
डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था-“वो आ रहा है…” स्याही वहीं फैल गई थी।
मायरा डरी हुई थी उस रात उसने कमरे को छोड़ने का फैसला कर लिया था उसको 6 महीने पूरे भी हो चुके थे, लेकिन अभी उसकी इंटर्नशिप पूरी नहीं हुई थी।

मायरा ने बैग पैक किया। दरवाज़ा खोला और बाहर निकल पड़ी भागती हुई वो कमरे से बाहर तो आई, लेकिन उसे चारों तरफ वही कमरा और वो डायरी दिखाई दे रही थी। मायरा का मन में कमरे को लेकर कई सवाल थे, वो अभी भी यही सोच रही थी क्या सच में उस कमरे में कोई साया था या सिर्फ उसके मन का वहम था।
भागते हुए मायरा की नजर एक शीशे पर पड़ी जिसमें मेरा के साथ कई और लड़कियां दिखाई दे रही थी और सब मानो उससे यही सवाल कर रही थीं कि आखिर वो कमरा नंबर 13 से बाहर कैसे निकली?
मायरा आज कमरे को छोड़कर वापस घर आने में तो सफल हो गई है, लेकिन उसे हर रात 3:13 पर दिखाई देता है वही एक साया…और सुनाई देती है एक फुसफुसाहट जिसमें आवाज आती है कमरा नंबर 13 अभी भी भूखा है कुर्बानी के लिए।

बिल्डिंग के गेट पर बोर्ड फिर से टंगा है ' कमरा नंबर 13 किराए पर उपलब्ध है', लेकिन वो कमरा आज भी खाली है...
यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हरजिंदगी के साथ।
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