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तीन दिन की बहू: अमायरा ने आखिर ऐसा क्या किया जिससे उसके ससुराल के लोगों की पूरी जिंदगी ही बदल गई और फिर...

अमायरा अपनी ससुराल में बहुत कम दोनों के लिए ही रुकी, लेकिन उसने सबका दिल ही जीत लिया। मानो उसमें कोई अलग ही बात थी, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि वो तीन दिन की बहू बन पाई? आखिर ऐसा क्या था उसकी ससुराल में जिसकी वजह से उसको मायके जाना पड़ा। पूरी कहानी आप भी यहां पढ़ें।
Editorial
Updated:- 2025-11-28, 12:13 IST

शादी को अभी मुश्किल से छह महीने ही बीते थे, लेकिन रिश्ता पहले ही टूट चुका था। ये अलग बात है कि अभी कागजों पर मुहर लगनी बाकी थी, लेकिन दिल से तो दोनों अलग ही हो चुके थे। अमायरा और विशाल की शादी के भले ही 6 महीने क्यों न बीत गए हों, लेकिन अमायरा ससुराल में तो केवल तीन दिन ही रही थी और उन तीन दिनों में ही कुछ ऐसा हुआ कि वो ससुराल छोड़कर वापस आ गई।
अमायरा अपने मायके वापस आ चुकी थी-थकी हुई, टूटी हुई और सबसे ज्यादा खुद से नाराज।

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उस दिन सुबह-सुबह सुबह फोन की घंटी बजी और जैसे ही अमायरा ने फोन उठाया तो फोन पर विशाल की मां रिया की आवाज सुनाई दी 'बेटा दादी की तबियत बहुत खराब है अगर तुम घर आ जाओ तो शायद उन्हें थोड़ी राहत मिल जाए, आज भी दादी को वो तुम्हारा तीन दिन ससुराल में रहना याद आता है और वो चिप-छिपकर रोटी रहती हैं।' अमायरा खुद से नाराज थी, लेकिन एक पल के लिए सोचने लगी कि वो उस घर में कैसे रह सकती है जहां विशाल भी है। अमायरा की आंखों में आंसू थे और दादी का चेहरा उसे सामने दिखाई दे रहा था। अमायरा ने बिना कुछ बोले ही फोन रख दिया और उधर से आवाज आती रही बेटा आ जरूर जाना शायद तुम्हे देखकर दादी सुकून से दुनिया से जा सकें।

अमायरा बहुत देर तक यही सोचती रही कि छह महीने में इतना कुछ बदल गया आखिरी बात लड़ाई पर खत्म हुई थी, लेकिन अब इस तरह से दादी का मुझे याद करना फिर विशाल की मां का यह संदेश? वह सोच में खोई ही थी कि तभी फोन की घंटी फिर से बजी और आवाज आई बेटा अमायरा फोन मत काटना
'तुमसे मिलने की जिद कर रही हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि तुम घर क्यों नहीं आती। याद करो वो दिन जब तुम्हारी शादी में दादी सबसे ज्यादा नाच रही थीं और उनकी आंखों में खुशी के आंसू झलक रहे थे। हम अब तक उन्हें सच्चाई नहीं बता पाए हैं। दादी को अभी भी लगता है कि तुम अपनी पढ़ाई पूरी करने कुछ दिनों के लिए बाहर गई हो।

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अमायरा का दिल पिघल गया। दादी तो उस पर जान छिड़कती थीं। उसको वो दिन भी याद आया जब उसने ससुराल में पहला कदम रखा था और दादी ने अपने बक्से की चाभी उसे थमा दी थी। बक्से में कुछ कीमती नहीं था बस दादी के कुछ पुराने गहने थे और दादा जी की तस्वीर। दादी ने बहुत प्यार से अमायरा को सोने की वो चेन पहनाई थी जो उनको दादा जी ने 25 वीं शादी की सालगिरह के दिन दी थी।
भला दादी को विशाल और मेरे रिश्ते की सच्चाई का क्या पता कि रिश्ता अब रिश्ता नहीं रहा और न ही मैं अब उस घर की बहू हूं, फिर भी दादी से मेरा एक अलग ही नाता है मैं दादी के पास जरूर जाउंगी। अमायरा फैसला कर चुकी थी कि वो दादी से मिलने जाएगी और उन्हें अपनी और विशाल की सच्चाई भी बताएगी।

थोड़ी हिचकिचाहट, थोड़ी उलझन और बहुत सारी भावनाओं के बीच अमायरा ने फैसला लिया और अगले दिन ही सुबह कैब बुक करके अपने ससुराल दादी से मिलने निकल पड़ी। जैसे ही कैब ससुराल के दरवाजे पर रुकी अमायरा का दिल तेजी से धड़कने लगा। घर के बड़े गेट में प्रवेश करते हुए इसे शादी के तुरंत बाद के वो तीन दिन याद आए जब वो ससुराल में रुकी थी, पुराण समय याद करके अमायरा की आंखें भर आईं और वो पूरी हिम्मत जुटाने के बाद ससुराल के बड़े गेट से भीतर चली गई।

जैसे ही अमायरा घर के भीतर पहुंची मानो बिस्तर पर बीमार पड़ी दादी की जान में जान आ गई। 'अरी बेटी अमायरा ! तू आ गई! देख मेरी दवाई कोई समय पर नहीं देता है, देख न कोई मुझे खाना भी टाइम पर नहीं देता है, बेटी तू अब पढ़ाई छोड़कर वापस आ जा नहीं तो मैं चल ही बसूंगी।'

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अमायरा दादी के गले लग गई और मुस्कुरा उठी। दादी वैसी ही थीं-चुलबुली, शिकायतों से भरी, लेकिन प्यार से उमड़ी हुई।

अमायरा ने अपना बैग नीचे रखा और दादी की दवाई का डिब्बा खोला। दादी की अस्थमा की दवाई खत्म हो गई थी, उसने तुरंत दादी की दवा मंगवाई और दादी से बातों में लग गई।
वैसे दादी के मेडिसिन बॉक्स में सब कुछ ही गड़बड़ था- कुछ टैबलेट मिसिंग थीं और कुछ की एक्सपाइयरी डेट ही हट गई थी। अरे दादी ये क्या कर रखा है? मैं चली क्या गई आपने तो अपना ध्यान रखना ही छोड़ दिया। दादी ने दबे मन से कहा 'अरे बेटा, बिना तेरे यहां मेरा कोई ध्यान ही नहीं रखता है। तू भी बोल कर गई थी कि जल्दी आएगी वापस, लेकिन आज इतने दिन के बाद आई है।

अमायरा को भीतर से टीस हुई। वह वहां आई हो क्यों थी ? वैसे दादी ने हमेशा उसे अपने परिवार की ही बेटी समझा था। विशाल की हरकतों को तो दादी जानती थीं, लेकिन उन्हें ये पता ही नहीं चला कभी कि विशाल ने अमायरा के साथ क्या किया।

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शाम हुई तो रिया को रसोई में व्यस्त देखकर अमायरा बोल पड़ी 'मम्मी जी…अरे सॉरी आंटी क्या मैं आपकी कुछ मदद कर दूं?'
रिया ने उसके हाथ को हल्के से छूते हुए कहा- अरे बीटा तुम मुझे मम्मी बोल सकती हो। तुम्हारे मुंह से बहुत दिनों बाद सुना ये। आओ न बेटा साथ में खाना बनाते हैं'
रसोई में पकने वाली गट्टे की सब्जी की खुशबू, चूल्हे पर छनकती कड़छी और सास-बहू की हंसी ठिठोली...दोनों के बीच एक अलग रिश्ता दिखाई दिया मानो पक्की सहेलियां काफी दिनों बाद मिल रही हों।
दोनों को एक अजीब-सी सहजता महसूस हुई। जैसे रिश्ते अभी टूटे नहीं थे बस शायद कुछ दिनों के लिए थम से गए थे। वैसे विशाल ने जो अमायरा के साथ किया उसे भुलाया भी तो नहीं जा सकता था। शादी के दूसरे ही दिन पता चला कि विशाल किसी और लड़की को प्यार करता है और उसने अमायरा से कहा कि वो उसे छोड़कर चली जाए। अमायरा उस दिन की याद में बहुत दुखी थी, लेकिन समय के साथ आगे बढ़ने में ही भलाई थी। फिर क्या था शादी के तीसरे ही दिन अमायरा ने ससुराल का घर छोड़ दिया था और वापस अपने घर चली गई थी।

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उस दिन जब वो वापस अपनी ससुराल दादी से मिलने आई तो बार-बार यही सोच रही थी कि आखिर विशाल ने उसके साथ ऐसा क्यों किया? आखिर उसमें कमी क्या थी? क्या विशाल ये बात उसको पहले से नहीं बता सकता था कि वो इस शादी के खिलाफ था? न जाने कितने सवाल आखों में लिए हुए वो यही सोच रही थी कि ये तो अच्छा था कि आज विशाल घर से बाहर था, नहीं तो वो दादी से मिलने के बाद तुरंत ही वापस लौट जाती। यही सब सोचते हुए कब अमायरा की आंख लग गई और उसे पता ही नहीं चला। रात को अमायरा उसी कमरे में सोई जिसका सपना लेकर वो विशाल की दुल्हन बनकर आई थी। अब वही कमरा उसे काट खाने को तैयार था और उसे घुटन लग रही थी, लेकिन थकान से उसकी जल्द ही आंख लग गई।

अगले दिन जब सुबह अमायरा की आंख खुली तो उसने पूरे घर में गहरी खामोशी महसूस की। दादी के कमरे में जाकर देखा तो दादी मुस्कुरा उठीं और बोलीं-
बेटा इस घर में सब ठीक है, लेकिन हंसी-खुशी नहीं है। जब से तू गई है, घर जैसे अधूरा सा लगता है। विशाल भी पता नहीं क्यों परेशान ही रहता है और एक कमरे में ही बंद रहता है। आज तो ऑफिस के काम की वजह से छह महीने बाद मनाली गया है।

अमायरा ने तभी दादी के कमरे की दीवार पर देखा जिसमें उसकी शादी की फैमिली फोटो लगी थी। फोटो में विशाल और अमायरा दोनों खुश नजर आ रहे थे, लेकिन अमायरा के चेहरे पर एक अलग खुशी दिखाई दे रही थी। अमायरा का दिल बैठ गया, फिर खुद को समझाया जिस पर उसका हक ही नहीं था उसके बारे में सोचना भी क्या।

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दोपहर को रिया रसोई में खाना बनाने के साथ कुछ खोज रही थी, तभी अमायरा ने पूछा कि वो क्या ढूढ़ रही हैं। रिया चौंक गई और मुस्कुराती हुई अमायरा से बोल पड़ी कि वो अपने सपने खोज रही है। कुछ ऐसे सपने जो उसकी एक डायरी में सिमटकर रह गए थे, कुछ ऐसे पल जो उसको शायद एक ग्रहणी से हटकर कुछ बना सकते थे। हां, रिया का भी एक सपना था कि वो अपना एक बुटीक खोले और हो भी क्यों न उसने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स जो किया था।
रिया अमायरा को यही बताते हुए तेजी से हंस पड़ी और बोल उठी कि उन्हीं सपनों को खोजने चली थी आज, लेकिन छोड़ो न। तुम अपनी कुछ बताओ बेटा।

डायरी मिलते ही उसमें रिया की डिज़ाइन से भरी स्केचबुक थी-सूट, ब्लाउज़, ड्रेसेस और भी बहुत कुछ छिपा था उस डायरी में।
अमायरा बोल उठी अरे मम्मी ये सब आपने बनाया? ये तो कमाल है!
रिया ने हामी भरी और बोल उठी शौक तो था बेटा… पर घर, बच्चे, जिम्मेदारियां और फिर…
रिया की आंखें अमायरा की ओर टिक गईं, फिर तुम्हारी शादी के बाद ये सपना पूरी तरह से छूट गया और तुम्हारे रूप में जो बेटी मिली थी वो भी दूर चली गई। वैसे बेटा विशाल ने जो भी किया वो गलत था, लेकिन उसके साथ भी कुछ अच्छा नहीं हुआ। तुम्हारे जाते ही विशाल को उस लड़की ने भी धोखा दे दिया जिससे वो शादी करना चाहता था और उसकी नौकरी भी चली गई। खुद को उसने एक बंद कमरे का हिस्सा बना लिया। अब उसकी नौकरी तो लग गई, लेकिन तुम्हारी कमी कोई पूरी न कर पाया। गलती विशाल ने की और उसे उसकी बहुत बड़ी सजा भी मिली। ' अमायरा खामोश थी, विशाल के बारे में सोच रही थी, लेकिन खुद से ही एक लड़ाई में उलझी हुई थी।

अमायरा को इस बात की कभी खबर ही नहीं थी कि विशाल के साथ भी इतना सब कुछ हो गया था। शायद वो अपनी गलती की सजा भुगत चुका था।
उसे एहसास हुआ कि कभी-कभी रिश्ते सिर्फ पति-पत्नी के नहीं, सपनों के भी होते हैं।

उसने तुरंत कहा-
'मम्मी, इस बार हम बुटीक का फाइनल प्लान बनाएंगे।
रिया ने हैरानी से देखा, लेकिन अमायरा के चेहरे की चमक इतनी सच्ची थी कि उन्होंने सिर हिलाकर हामी भर दी।

शाम को, जब विशाल आया, घर का माहौल देखकर वो रुका और अमायरा से पूछा 'तुम ठीक हो?”
अमायरा ने हामी भरी और एक शब्द कहा-हां
दोनो के बीच एक चुप्पी थी, लेकिन यह चुप्पी पहली बार असहज नहीं थी।
विशाल ने आगे बढ़कर कहा-
'दादी बहुत खुश हैं कि तुम आई हो… सच कहूं हम सब बहुत खुश हैं, अमायरा ने हल्की सी हंसी के साथ कहा हां सब खुश दिख रहे हैं।'

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अगले दिन अमायरा वापस मायके जाने के लिए तैयार थी। उसने दादी की दवाइयां मंगवाकर रख दी थीं, मां के बुटीक के लिए बात कर ली थी, विशाल से बैठकर उसने थोड़ी देर बात की और उसको भी जीवन में आगे बढ़ने की सलाह दी। अमायरा वापस घर की बहू नहीं बन सकती थी, लेकिन दादी की सबसे अच्छी पोती और मां के बेटी जरूर बन गई थी। रही बात विशाल की, तो अमायरा और विशाल अब अच्छे दोस्त थे और दोनों ने एक-दूसरे के लिए जीवनसाथी ढूंढ़ने का फैसला लिया था।

अमायरा को जाते समय रिया ने गले लगाया और उसकी आंखों में आंसू आ गए। वो बोल पड़ी- 'तू बहू बनकर आई थी और बेटी बनकर जा रही है।'

दादी ने अमायरा का हाथ पकड़कर कहा- बेटा फिर से जल्दी आना और कुछ दिन रुकना... शायद दादी भी समझ चुकी थी कि अमायरा अब विशाल की पत्नी की तरह यहां नहीं रहेगी।

अमायरा तेजी से हंस पड़ी, लेकिन आज उसकी हंसी में दर्द से ज्यादा ख़ुशी थी... वो तीन दिन के लिए जिस घर में बहू बनकर आई थी आज उसी घर की बेटी के रूप में घर से बाहर जा रही थी...

अमायरा की गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और पीछे उसकी ‘तीन दिन की ससुराल’ थी, जो अब उसका ससुराल नहीं बल्कि दूसरा मायका बन चुका था।

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उसने खुद से कहा- 'मैं टूटी नहीं हूं … बस बदल चुकी हूं और बदलाव हमेशा एक नई शुरुआत होता है...

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