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magh mela prayagraj aghori sadhu was talking to sangam mystery suspense story

माघ मेला में अकेले संगम से बात करने वाला अघोरी कौन था? जब सभी साधु स्नान कर रहे थे तब उसने हाथ उठाया और...

लाली..लाली, भीड़ बहुत ज्यादा थी, लेकिन कोई एक आवाज लाली को अपनी ओर बुला रही थी। वह चौंक गई। यह आवाज उसने पहले भी सुनी थी। वह धीरे धीरे उस आवाज की दिशा में बढ़ी.
Editorial
Updated:- 2026-01-02, 13:48 IST

माघ मेले के शुरू होने का इंतजार हर कोई कर रहा था, लेकिन एक अघोरी बाबा ऐसे भी थे, जिनके लिए यह मेला उतना खास नहीं था। वह हर दिन सुबह उठकर संगम के किनारे अकेले भोर में बैठकर नदी से बात करता था। वैसे तो उस समय उसे कोई नहीं देख पाता था, लेकिन अगर किसी ने गलती से देख भी लिया, तो लोग उसे पागल ही समझते थे। संगम के किनारे ही एक परिवार रहता था, जो सड़क पर रात गुजारता था। उनकी एक पांच साल की बेटी थी। वह रोज भोर में बाबा को नदी से बात करते हुए देखती थी। हैरानी की बात यह थी कि बाबा भी यह जानते थे कि कोई उन्हें देख रहा है, लेकिन उन्होंने कभी उस बच्ची से कुछ नहीं कहा। बच्ची को भी बाबा से कभी डर नहीं लगा। उसने कभी यह बात अपने माता पिता को नहीं बताई कि बाबा पानी की तरफ देखकर किसी से बातें करते हैं।

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जैसे-जैसे माघ मेला नजदीक आ रहा था, बाबा अब कुछ निराश नजर आने लगे थे। मेला शुरू होने में बस एक दिन बचा था और उस दिन बाबा भोर में नदी किनारे बात करने नहीं आए। बच्ची को लगा कि बाबा आज भी आएंगे, लेकिन वह दिन बीत गया। वह इधर उधर संगम के पास बाबा को ढूंढती रही, लेकिन बाबा कहीं दिखाई नहीं दिए।

तभी दूर से उसने किसी को पानी में उतरते देखा। सर्दी का मौसम था और कोई इतनी सुबह बर्फ जैसे ठंडे पानी में उतर रहा था। धीरे धीरे वह आदमी और गहरे पानी की तरफ बढ़ता जा रहा था। बच्ची को वह अघोरी बाबा जैसा ही लगा। उसने पहले भी बाबा को कहते सुना था कि उन्हें माघ मेला पसंद नहीं है। वह भागते हुए चिल्लाने लगी- बाबा बाबा पानी गहरा है, बाबा सुनिए आप कहां जा रहे हैं, आइए मैं आपसे बात करूंगी।
लेकिन वह आदमी नहीं रुका और गहरे पानी में चला गया। यह देखकर बच्ची बहुत घबरा गई। उसकी आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह संगम के किनारे बैठकर रोती रही।
उधर दूसरी तरफ उसके मां बाप उसे ढूंढ रहे थे।- लाली कहां है? सुबह से लाली नहीं दिख रही। तभी उन्हें दूर से लाली पानी के किनारे बैठी नजर आई। लाली की मां दौड़कर उसके पास पहुंची- क्या रे लाली यहां क्या कर रही है, हम सुबह से तुझे ढूंढ रहे हैं।

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मां को देखते ही लाली उनके सीने से लिपट गई और जोर जोर से रोने लगी- मां बाबा नहीं रहे, मैंने उन्हें बहुत रोका, लेकिन वह पानी में चले गए। मां ने लाली को समझाते हुए कहा- कौन से बाबा, वही जो अकेले बैठकर बातें करते रहते हैं, लाली ने सिर हिलाकर कहा… हां मां। लाली की मां हल्की हंसी के साथ बोली-अरे पगली, उन्हें कुछ नहीं होगा, तूने सपना देखा होगा, इतने सालों से वह यहीं हैं, वह पानी में क्यों जाएंगे। लेकिन लाली और भी रोने लगी- नहीं मां, मैं झूठ नहीं बोल रही, वही बाबा थे, अब बाबा कभी नहीं आएंगे, मुझे पता है। लाली के पापा ने उसे गोद में उठाया और प्यार से चुप कराते हुए कहा- बेटा कोई बात नहीं, अगर बाबा नहीं आएंगे तो क्या हुआ, कल से माघ मेला शुरू हो रहा है। यहां और भी बहुत सारे बाबा आ जाएंगे यह सुनकर लाली थोड़ा शांत हो गई। हैरानी की बात यही थी कि पांच साल की बच्ची को उस अघोरी बाबा से कभी डर नहीं लगा था।

माघ मेले का पहला दिन आ गया था। संगम के किनारे सुबह से ही भीड़ बढ़ने लगी थी। साधु संतों के डेरे लग चुके थे। हर तरफ शंख, घंटी और मंत्रों की आवाजें गूंज रही थीं। लाली अपने मां बाप के साथ वहीं खड़ी थी, मेला में उसके माता-पिता लोगों को चाय बांटने का काम कर रहे थे। मां ने लाली से कहा- बेटा कहीं मत जाना, भीड़ देख रही हो कितनी ज्यादा है। तुम खो जाओगी। अगर फिर भी तुम्हें लगे कि तुम खो गई हो तो, यहां बाहर गेट नंबर 1 के पास ही खड़े रहना। हम वहीं आ जाएंगे। ये बोलते हुए लाली की मां ने उसकी जेब में 100 रुपये का नोट डालते हुए कहा- भूख लगे, तो कुछ खा लेना, लेकिन यहां से कहीं मत जाओ, हमारे साथ ही रहो।

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लाली का ध्यान मां की बातों पर नहीं थे. वह बस भीड़ को देख रही थी, लेकिन उसका मन कहीं और था। उसकी आंखें बार बार संगम की तरफ चली जाती थीं। उसे पूरा भरोसा था कि बाबा अब नहीं आएंगे। लेकिन फिर भी उसका दिल मानने को तैयार नहीं था। तभी अचानक लाली की नजर संगम के उस कोने पर पड़ी, जहां बाबा हर सुबह बैठते थे। भीड़ के बीच, धुंध और धूप के बीच, उसे एक जानी पहचानी आकृति दिखाई दी। वही राख लगा शरीर, वही बिखरे बाल। उसे लगा बाबा वहां खड़े हैं। वह भागते हुए बाबा के पास चली गई। भीड़ में कब लाली अपने मां-बाप से दूर हो गई, उन्हें पता भी नहीं चला। दोनों लोगों को चाय बांटने में बिजी थे। लाली जैसे ही बाबा के पास गई, वहां कोई और था। हर बाबा एक तरह नजर आ रहे थे, उसे इसलिए सब पीछे से एक ही तरह लग रहे थे।

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उसका दिल जोर जोर से धड़कने लगा। उसने एक बाबा की ओर देखा, फिर दूसरे की ओर। कोई ध्यान नहीं दे रहा था। सब अपने अपने काम में लगे थे। लाली की आंखों में आंसू भर आए। तभी उसे किसी की धीमी आवाज सुनाई दी। लाली..लाली, भीड़ बहुत ज्यादा थी, लेकिन कोई एक आवाज लाली को अपनी ओर बुला रही थी। वह चौंक गई। यह आवाज उसने पहले भी सुनी थी। वह धीरे धीरे उस आवाज की दिशा में बढ़ी..वह चलती जा रही था, लेकिन आवाज बंद नहीं हो रही थी। भीड़ को चीरते हुए, उसे आस-पास कोई शोर नहीं सुनाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे लाली पर किसी ने जादू कर दिया है। चलते-चलते संगम का ऐसा किनारा आ गया था, जहां कोई व्यक्ति नहीं था, तभी पानी में से आवाज आई। लाली, बेटा मुझे क्यों ढूंढ रही हो…मुझे जहां सब पागल समझते हैं और जिसके बारे में कभी किसी ने नहीं सोचा, जिसका कभी किसी ने इंतजार नहीं किया, बेटी तुम उसे क्यों ढूंढ रही हो।

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लाली ने रोते हुए कहा- बाबा आप पानी में क्यों चले गए। मैं आपको रोक रही थी, आपको सब पागल समझते हैं, लेकिन मैं नहीं समझती। बाबा थोड़ी देर शांत हो गए-फिर बोले मैं संगम से बातें करता हूं

लेकिन वह मुझे जवाब शब्दों में नहीं देता, वह मुझे लोगों की पीड़ा दिखाता है। लाली ने पूछा- तो आप उस दिन पानी में क्यों चले गए थे? मैं कहीं नहीं गया - बाबा ने कहा, तुम मुझसे इतना ज्यादा प्यार करती हो, मैंने सोचा भी नहीं था। तुम्हें पता है मैं किससे बात करता हूं, लाली ने कहा- हां बाबा, आपको संगम से प्यार है न। आप संगम से बात करते हैं। बाबा ने हंसते हुए कहा- मेरी समझदार बेटी…एक तुम ही हो, जिसने मुझे पहला बार सही समझा है। मैंने सिर्फ संगम से वादा किया था- कि माघ मेले के पहले दिन, मैं खुद को लोगों की नजरों से छुपा लूंगा।

लाली हैरान हो गई और बोली क्यों बाबा? बाबा बोले- क्योंकि मेले में लोग भीड़ बनकर आते हैं और यहां गंदगी फैलाते हैं। शोर होता है। भीड़ में किसी की आवाज सुनाई नहीं देती, मुझे उन लोगों के लिए रुकना था, जो भीड़ से अलग होते हैं। बाबा ने लाली से कहा- बेटा तुम्हें अगर मुझसे बात करना हो, तो आवाज लगाना, मैं तुम्हारी बात का जरूर जवाब दूंगा, मैं यहीं हूं संगम के पास। लाली ने हंसते हुए कहा- सच बाबा..मैं फिर रोज आपसे बात करूंगी। इस तरह लाली भी पानी की तरफ देखकर रोज बात करने लगी। लाली के मां-बाप को लगने लगा कि शायद लाली भी बाबा जैसी हो गई है, लोग उसे भी पागल कहेंगे, इसलिए वह संगम से दूर रहने लगे, लेकिन जब भी वह माघ मेला के दौरान संगम आते, अपनी बेटी को भी साथ लाते। वह रोज थोड़ी देर संगम के पास बैठकर बातें करती। ऐसा लग रहा था जैसे, बाबा भी संगम में इसी तरह किसी अपने से बातें करते थे। लोग उन्हें पागल समझते थे, लेकिन ऐसा नहीं था।

यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।

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image credit- freepik

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