
ऐसा कहा जाता है कि जिसने मानव रूप में जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी निश्चित है। ऐसे ही भगवान श्री कृष्ण जिन्हें भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में पूजा जाता है उन्होंने भी मानव रूप में जन्म लिया था। इसी वजह से उनकी मृत्यु होना भी तय था। हमारे मन में श्री कृष्ण के जन्म को लेकर तो कई सवाल होते ही हैं, लेकिन कई बार यह एक सवाल भी आता है कि आखिर कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई होगी और उनके आखिरी शब्द क्या रहे होंगे। श्री कृष्ण के वो आखिरी शब्द जिसके बाद उन्होंने देह त्याग दी थी। भगवद गीता के अनुसार गुजरात के भालका तीर्थ पर स्थित एक पीपल के पेड़ के पास ही श्री कृष्ण ने अपने प्राण त्यागे थे। कृष्ण जी की मृत्यु और उनके आखिरी शब्दों के बारे में कई बातें प्रचलित हैं। आइए ज्योतिर्विद पंडित रमेश भोजराज द्विवेदी से जानें उन कथाओं के बारे में और भगवत गीता में लिखे शब्दों के बारे में जो कृष्ण ने आखिरी बारे बोले थे।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार श्री कृष्ण भालका तीर्थ पर स्थित एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान श्री कृष्ण बांसुरी बजा रहे थे तभी वहां से जरा नाम का एक बहेलिया निकला और उसे श्री कृष्ण दिखाई नहीं दिए। बहेलिया को लगा कि वहां कोई हिरन मौजूद है और उसने हिरन समझकर श्री कृष्ण पर बाण चला दिए। बाण सीधा श्री कृष्ण के दाहिने अंगूठे पर लगा। जब जरा ने अपने आराध्य को इस हाल में देखा तो वह जोर-जोर से विलाप करने लगा। श्री कृष्ण ने बहेलिया को चुप कराते हुए कहा कि " तू रो मत यह मेरी ही लीला थी और तुम्हें वह अवसर मिला है जिसके लिए ऋषि मुनि भी सदियों तक तपस्या करते थे। इसके साथ ही उन्होंने कुछ शब्द बहेलिये से बोले जो श्री कृष्ण के आखिरी शब्द के रूप में प्रचलित हुए।

भगवान श्री कृष्ण को जब जरा का बाण लगा तब उन्होंने कुछ शब्द बोले वो थे "यह तुम्हारा दोष नहीं है; यह तो होना ही था। डरो मत या दुखी मत हो, क्योंकि यही तो नियति का नियम है " यही शब्द श्री कृष्ण के आखिरी शब्द के रूप में प्रचलित हुए और इन्हीं वचनों को कहने के बाद श्री कृष्ण ने अपनी देह त्याग दी थी। भगवान श्री कृष्ण केवल विष्णु जी का एक अवतार ही नहीं थे बल्कि करुणा, नीति और कर्मयोग का सजीव स्वरूप भी थे। उनका संपूर्ण जीवन मानवता को धर्म, प्रेम और कर्तव्य का मार्ग दिखाता है।
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श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने गुजरात के भालका तीर्थ में अपनी देह का त्याग किया था और उन्होंने अपने आखिरी शब्द जरा नाम के बहेलिये से कहे थे। जब श्री कृष्ण के अंगूठे पर जरा का बाण लगा और उसे होनी इस बड़ी भूल का पश्चाताप हुआ तब वह रोता-बिलखता हुआ श्री कृष्ण के चरणों में गिर पड़ा। उसे लगा कि उसने बहुत बड़ा अपराध कर दिया है। लेकिन यहां भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप केवल ईश्वर का नहीं, बल्कि करुणा के सागर का था, इसलिए उन्होंने इसे नियति का खेल बताया। शास्त्रों के अनुसार, यही वाक्य भगवान श्री कृष्ण के अंतिम शब्द माने जाते हैं। इन शब्दों के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इस संसार में होने वाली हर घटना कर्म और नियति के अनुसार ही होती है और किसी को इसके लिए दोषी ठहराना उचित नहीं है।

पुराणों में इस बात का उल्लेख है कि श्री कृष्ण की मृत्यु का यह कारण एक पूर्व श्राप से जुड़ा था। कथा के अनुसार, बालि के छल पूर्वक वध के समय भगवान श्री राम ने छिपकर बाण चलाया था। इसी वजह से बाली ने उन्हें श्राप दिया था कि अगले जन्म में उन्हें भी इसी तरह छल का सामना करना पड़ेगा। इसी वजह से कृष्ण अवतार के रूप में उनकी मृत्यु छल से ही हुई। यह इस बात का भी संकेत है कि किसी भी व्यक्ति को कर्मों का फल किसी न किसी जन्म में जरूर मिलता है।
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श्री कृष्ण के आखिरी शब्द हमें किसी भी घटना को नियति से जुड़ने का संकेत देते हैं। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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