
हिंदू धर्म ग्रंथों और शास्त्रों में कर्म के सिद्धांत को सर्वोपरि माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, किसी व्यक्ति की मेहनत की कमाई या हक मारना सबसे बड़े पापों में से एक है। इसे 'अधर्म' की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि धन केवल कागज का टुकड़ा नहीं होता बल्कि उसमें उस व्यक्ति की ऊर्जा, समय और उसके परिवार की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। जब कोई व्यक्ति बल, छल या पद का दुरुपयोग करके किसी गरीब या मेहनती इंसान का पैसा हड़पता है तो वह केवल धन नहीं बल्कि उस व्यक्ति की हाय भी साथ ले जाता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने साफ कहा है कि अन्याय से कमाया गया धन कभी सुख नहीं देता बल्कि वह विनाश का कारण बनता है। इसी कड़ी में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स ने हमें बताया कि जो व्यक्ति किसी का धन हड़प लेते है उनके लिए शास्त्रों में किस सजा का उल्लेख मिलता है?
शास्त्रों में उल्लेख है कि 'अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति' अर्थात अन्याय और धोखे से कमाया गया धन अधिकतम दस वर्षों तक ही टिकता है। ग्यारहवें वर्ष में वह धन मूल के साथ-साथ व्यक्ति के संचित पुण्य और अपनी सुख-संपत्ति को भी साथ ले जाता है। किसी की मेहनत हड़पने वाले का पैसा अक्सर बीमारी, मुकदमों या व्यर्थ के कामों में खर्च हो जाता है और अंत में वह व्यक्ति फिर से दरिद्रता की स्थिति में आ जाता है।

गरुड़ पुराण में बताया गया है कि पराया धन हड़पने वाले व्यक्ति का मन कभी शांत नहीं रहता। भले ही उसके पास भौतिक सुख-सुविधाएं हों, लेकिन उसे रात में चैन की नींद नहीं आती। चोरी या बेईमानी से लाया गया पैसा घर में कलह, संतानों का बिगड़ना और परिवार में अशांति पैदा करता है। शास्त्रों के अनुसार, जिस अन्न को दूसरे का हक मारकर खरीदा गया हो उसे खाने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और व्यक्ति गलत निर्णय लेने लगता है।
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पुराणों में पराया धन हड़पने वालों के लिए कठोर सजाओं का वर्णन है। 'श्रीमद्भागवत' के अनुसार, जो लोग दूसरों की जीविका छीनते हैं या छल से धन लेते हैं उन्हें कौरव या अंधतामिस्र नामक नरक की यातनाएं झेलनी पड़ती हैं। ऐसा माना जाता है कि मरने के बाद आत्मा को उन कष्टों का सामना करना पड़ता है जो उसने उस मेहनती व्यक्ति को दिए थे। कई ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि दूसरों का हक मारने वाला व्यक्ति अगले जन्म में पशु या प्रेत योनि में जन्म लेता है।

यह एक कड़वा सच है जिसे शास्त्र बार-बार दोहराते हैं 'पिता के पाप का फल संतानों को भुगतना पड़ता है।' जब कोई व्यक्ति किसी की मेहनत की कमाई हड़पकर अपने बच्चों को पालता है तो वह अनजाने में उनके भाग्य में बाधाएं उत्पन्न कर रहा होता है। अधर्म की कमाई से पली-बढ़ी संतानें अक्सर माता-पिता के दुख का कारण बनती हैं और कुल का नाम खराब करती हैं।
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अगर कोई व्यक्ति बहुत पूजा-पाठ करता है या दान देता है, लेकिन साथ ही दूसरों का पैसा भी हड़पता है तो उसके द्वारा किए गए सभी पुण्य कर्म शून्य हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, भगवान ऐसे व्यक्ति की पूजा स्वीकार नहीं करते जिसने किसी का दिल दुखाया हो। दान केवल उसी धन का सफल होता है जो ईमानदारी और परिश्रम से कमाया गया हो।
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