
हिंदू धर्मग्रंथों और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, मानव शरीर को 'नौ द्वारों वाला नगर' यानी कि 'नवद्वारपुर' कहा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता और कठोपनिषद जैसे ग्रंथों में वर्णन है कि आत्मा इस नश्वर शरीर में नौ द्वारों के माध्यम से निवास करती है और मृत्यु के समय इनमें से किसी एक मार्ग से बाहर निकलती है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से प्राणों का निकास व्यक्ति के संचित कर्मों, उसकी आध्यात्मिक अवस्था और कुंडली के आठवें व बारहवें भाव की स्थिति पर निर्भर करता है। माना जाता है कि प्राण किस द्वार से निकले हैं, यह उस जीव की अगली गति और उसके द्वारा जीवन भर किए गए सत्कर्मों या पापों का संकेत देता है। आइये जानते हैं इस बारे में वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से।
मानव शरीर में सात द्वार सिर में (दो आंखें, दो कान, दो नथुने और एकमुंह) तथा दो द्वार शरीर के निचले हिस्से में (गुदा और जननेंद्रिय) होते हैं। इनके अतिरिक्त एक 'दसवां द्वार' भी होता है जिसे ब्रह्मरंध्र कहा जाता है।
आंखों से प्राण निकलना: जब प्राण आंखों के मार्ग से निकलते हैं तो व्यक्ति की आंखें खुली रह जाती हैं या पथरा जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार, यह इस बात का संकेत है कि व्यक्ति का मोह-माया और सांसारिक दृश्यों में गहरा जुड़ाव था। ज्योतिषीय दृष्टि से इसे मध्यम गति माना जाता है, जहां जीवात्मा पुनः मृत्युलोक में जन्म ले सकती है।

कानों से प्राण निकलना: अगर मृत्यु के समय प्राण कानों के मार्ग से बाहर जाते हैं तो यह माना जाता है कि व्यक्ति ने जीवन भर ज्ञान अर्जन किया या धार्मिक श्रवण में रुचि रखी। हालांकि, यह भी सामान्य सांसारिक गति का ही परिचायक है।
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मुंह से प्राण निकलना: मुंह से प्राण निकलना सबसे सामान्य माना जाता है। अगर कोई व्यक्ति शांत भाव से मुंह खोलकर प्राण त्यागता है तो इसे शुभ माना जाता है। ऐसे लोग अक्सर पृथ्वी पर वापस आते हैं लेकिन एक अच्छे और धार्मिक परिवेश में जन्म लेते हैं।
नाक से प्राण निकलना: नाक के छिद्रों से प्राणों का जाना योग और प्राणायाम का अभ्यास करने वाले व्यक्तियों में देखा जा सकता है। इसे एक संतुलित जीवन का संकेत माना जाता है।
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निचले द्वारों (मल-मूत्र मार्ग) से प्राण निकलना: हिंदू धर्मग्रंथों जैसे गरुड़ पुराण के अनुसार, अगर प्राण गुदा या जननेंद्रिय के मार्ग से निकलते हैं तो इसे अशुभ माना जाता है। यह संकेत देता है कि व्यक्ति ने जीवन भर तामसिक कर्म किए हैं या वह अत्यधिक वासना और निम्न प्रवृत्तियों में लिप्त रहा है। ऐसे जीव को अक्सर कष्टकारी गतियों या निम्न योनियों का सामना करना पड़ता है।

सबसे श्रेष्ठ मार्ग ब्रह्मरंध्र (दसवां द्वार): यूं तो शरीर के नौ द्वार प्रसिद्ध हैं, लेकिन योगियों और ऋषियों के लिए एक 'दसवां द्वार' अत्यंत महत्वपूर्ण है जो सिर के शीर्ष (तालु) पर होता है। जब प्राण सिर के ऊपरी हिस्से को भेदकर निकलते हैं तो उसे कपाल क्रिया या दिव्य प्रस्थान कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, जिस व्यक्ति के प्राण यहां से निकलते हैं वह सीधे मोक्ष को प्राप्त होता है और उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। ज्योतिष में इसे कुंडली के 'मोक्ष भाव' की अत्यंत शुभ स्थिति और बृहस्पति की कृपा से जोड़कर देखा जाता है।
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