
सनातन धर्म में किसी भी अन्य पर्वों की तरह ही फुलेरा दूज का भी विशेष महत्व होता है। आइए मान्यता है कि ब्रज में इसी दिन से होली शुरू हो जाती है। यह पर्व हर साल फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 19 फरवरी को मनाया जाएगा। यह दिन पूर्ण रूप से भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रेम को समर्पित है। इस दिन विधि विधान से कृष्ण जी के साथ राधा-रानी की पूजा की जाती है और कहा जाता है कि ऐसा करने से राधा-कृष्ण हमारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इस दिन भक्त जन विधि-विधान के साथ फुलेरा दूज की पूजा करते हैं और फुलेरा दूज की व्रत कथा का पाठ करते हैं। ऐसी मान्यता है कि फुलेरा दूज के दिन जो भी काम किया जाता है उसमें सफलता अवश्य मिलती है। आइए जानें फुलेरा दूज की व्रत कथा के बारे में विस्तार से।
फुलेरा दूज की कथा के अनुसार एक बार की बात है भगवान श्री कृष्ण बहुत ज्यादा व्यस्त हो गए और कई दिनों तक वृंदावन नहीं आ सके। यही नहीं राधा रानी से भी मिल नहीं पाए। ऐसे में राधा रानी बहुत ही परेशान हो गईं और ग्वाले गोपियां भी परेशान और उदास होने लगे। राधा रानी कृष्ण की याद में मुरझाने लगीं और वहां के सभी पेड़-पौधे और फूल तक मुरझाने लगे। जब भगवान श्रीकृष्ण ब्रज को छोड़कर द्वारका चले गए थे, तब उनके वियोग में ब्रज की प्रकृति भी शोक में डूब गई। वृक्ष सूखने लगे, लताओं ने फूल देना बंद कर दिया, कुंडों का जल कम हो गया और यमुना भी मानो विरह में व्याकुल हो उठी। गोप-गोपियां और ब्रजवासी अत्यंत दुखी रहने लगे। उसी समय देवर्षि नारद द्वारका पहुंचे और भगवान कृष्ण को ब्रजवासियों की व्यथा सुनाई। उन्होंने बताया कि आपके बिना ब्रज की रौनक समाप्त हो गई है, प्रकृति तक शुष्क हो गई है।

यह सुनकर भगवान कृष्ण का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने ब्रज लौटने का निश्चय किया। जब उनके ब्रज आगमन का समाचार मिला तो पूरा क्षेत्र आनंद से भर गया। माता यशोदा दौड़कर आईं और उन्होंने कृष्ण को हृदय से लगा लिया। कहा जाता है कि जिस स्थान पर यह मिलन हुआ, वह स्थान आज भी श्रद्धा का केंद्र माना जाता है। भगवान श्री कृष्ण से मिलने की इच्छा में राधा रानी और गोपिकाएं तड़प रही थीं और श्री कृष्ण को देखते ही राधा रानी प्रसन्न हो गईं। सभी पेड़-पौधे सभी पेड़-पौधे पहले की तरह हरे-भरे हो गए। उसी समय ख़ुशी से श्री कृष्ण ने फूल तोड़कर राधा रानी के ऊपर बरसाने शुरू कर दिए।
ऐसी मान्यता है कि उस दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि थी और श्री कृष्ण ने जब राधा रानी पर फूलों की वर्षा की तब से ब्रज में फूलों की होली मनाई जाने लगी और फुलेरा दूज के दिन से ही ब्रज में होली की शुरुआत हो जाती है। उसी समय से हर साल ब्रज में फूलों की होली खेलने की परंपरा भी शुरू हो गई। फुलेरा दूज का दिन फाल्गुन महीने का एक पवित्र दिन है इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है और इसे सर्दियों के मौसम में विवाह के लिए अंतिम शुभ दिन भी माना जाता है। इसलिए इस दिन अबूझ मुहूर्त में कई विवाह भी होते हैं।

फुलेरा दूज के पावन अवसर पर व्रत कथा का पाठ करना विशेष रूप से फलदायी होता है। यह पर्व फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला यह उत्सव विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जिस तरह से कुछ प्रदेशों में सूर्य षष्ठी का विशेष महत्व है, उसी प्रकार ब्रज में फुलेरा दूज का पर्व बहुत पवित्र माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन से ब्रज में होली उत्सव की शुरुआत भी होती है और वातावरण में रंग, भक्ति और आनंद का संचार होने लगता है।
ब्रजवासियों ने इसी दिन भगवान के स्वागत में फूलों और गुलाल से होली खेली। उसी दिव्य लीला की स्मृति में फुलेरा दूज का पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि फुलेरा दूज की तिथि अत्यंत शुभ होती है। इसे अभिजीत योग के समान फलदायी माना गया है। इस दिन बिना पंचांग देखे हुए किसी भी नए काम की शुरुआत की जा सकती है। वाहन खरीदना, संपत्ति की रजिस्ट्री, नया व्यवसाय शुरू करना, विवाह संबंध की बात करना या कोई भी मंगल कार्य प्रारंभ करना शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन शुरू किया गया कार्य सफलता की ओर अग्रसर होता है।
यदि आप भी फुलेरा दूज में श्री कृष्ण और राधा रानी की पूजा करने के साथ यहां बताई व्रत कथा का पाठ करती हैं तो आपके ऊपर सदैव श्री कृष्ण की कृपा बनी रहेगी। आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसे ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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