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Maa Siddhidatri Vrat Katha: चैत्र नवरात्रि के नौंवे दिन करें मां सिद्धिदात्री की पूजा, पढ़ें उनकी पौराणिक कथा

Maa Siddhidatri Vrat Katha: चैत्र नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। ऐसे में आप व्रत कथा को जरूर पढ़ें, ताकि आपकी पूजा संपन्न हो सके।
Editorial
Updated:- 2026-03-27, 06:10 IST

नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। जैसा कि उनके नाम से स्पष्ट है, वे सभी प्रकार की 'सिद्धियों' को देने वाली देवी हैं। भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से समस्त सिद्धियां प्राप्त की थीं। इसलिए इस दिन कई सारे लोग सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए माता की पूजा और व्रत कथा को पढ़ते हैं। साथ ही खास तरह की पूजा करते हैं, ताकि जीवन की परेशानियां कम हो सके। आइए आपको आर्टिकल में पौराणिक कथा के बारे में बताते हैं।

मां सिद्धिदात्री की पौराणिक व्रत कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सृष्टि के प्रारंभ में चारों ओर केवल अंधकार था और सृष्टि की रचना अभी शेष थी, तब भगवान शिव ने शक्ति की सर्वोच्च देवी, आदि शक्ति की घोर तपस्या की। भगवान शिव की तपस्या से प्रसन्न होकर आदि शक्ति ने स्वयं को दो रूपों में प्रकट किया। उनका एक रूप साक्षात शक्ति 'मां सिद्धिदात्री' का था। कहा जाता है कि मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव को आठों सिद्धियां (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्राप्त हुई थीं। देवी की इस महान अनुकम्पा के कारण ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हो गया और वे संसार में 'अर्धनारीश्वर' के नाम से प्रसिद्ध हुए। यह इस बात का प्रतीक है कि शिव और शक्ति एक ही हैं, उनके बिना सृष्टि का संचालन असंभव है।

दानवों का संहार और देवताओं की रक्षा

एक अन्य प्रसंग के अनुसार, जब महिषासुर जैसे भयंकर दानव का अत्याचार तीनों लोकों में बढ़ गया और देवताओं का स्वर्ग छिन गया, तब सभी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। तब तीनों देवों के तेज से एक दिव्य शक्ति उत्पन्न हुई, जिसे मां सिद्धिदात्री के रूप में पूजा गया। देवी ने अपनी अपार शक्तियों और सिद्धियों के बल पर असुरों की विशाल सेना का विनाश किया और अंत में महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया।

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मां सिद्धिदात्री का स्वरूप और महिमा

मां सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर विराजमान हैं और सिंह उनकी सवारी है। उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें वे गदा, चक्र, शंख और कमल का फूल धारण करती हैं। वे केवल देवताओं या ऋषियों की ही आराध्य नहीं हैं, बल्कि गंधर्व, यक्ष, असुर और मनुष्य भी अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए उनकी शरण में जाते हैं।

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पूजा का महत्व

मान्यता है कि नवरात्रि के नौवें दिन जो भक्त विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा से मां सिद्धिदात्री की पूजा करता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। मां की कृपा से भक्त के लिए ब्रह्मांड में कुछ भी अमुश्किल नहीं रह जाता। इस दिन कन्या पूजन का भी विशेष महत्व है, जिसे नौ कन्याओं को भोजन कराकर संपन्न किया जाता है।

आप भी मां सिद्धिदात्री की पूजा करते समय व्रत कथा का वर्णन जरूर करना चाहिए, ताकि आपके ऊपर हमेशा माता का आशीर्वाद बना रहे। कथा के साथ-साथ आप माता की आरती भी जरूर करें।

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Image credit- Freepik

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